विषय: रेलवे ग्रुप D – जीव विज्ञान (कोशिका ऊतक और जीवन प्रक्रियाएँ) अध्याय: 17.6 पोषण और पाचन विषय-वस्तु: पोषण प्रकार, मानव पाचन
सभी जीवों को जीवित रहने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। भोजन से प्राप्त पोषक तत्व ऊर्जा प्रदान करते हैं और शरीर की रचना एवं कार्यों में सहायक होते हैं। जिस प्रक्रिया द्वारा जीव भोजन ग्रहण करते हैं और उसका उपयोग करते हैं, उसे पोषण (Nutrition) कहते हैं। पोषक तत्वों के मुख्य प्रकार हैं- कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज लवण और जल। कार्बोहाइड्रेट और वसा ऊर्जा प्रदान करते हैं, प्रोटीन शरीर का निर्माण एवं मरम्मत करते हैं, तथा विटामिन और खनिज शरीर की क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं।
पोषण के आधार पर जीवों को दो मुख्य श्रेणियों में बाँटा जाता है। जो जीव अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, वे स्वपोषी (Autotrophs) कहलाते हैं, जैसे हरे पादप। जो जीव भोजन के लिए अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं, वे विषमपोषी (Heterotrophs) कहलाते हैं, जैसे मनुष्य, जंतु, कवक। विषमपोषी पोषण के भी कई प्रकार होते हैं, जैसे मृतजीवी (सैप्रोफाइटिक), परजीवी, कीटभक्षी और सहजीवी पोषण।
पाचन (Digestion) वह प्रक्रिया है जिसमें जटिल भोजन कण सरल, घुलनशील तत्वों में विघटित हो जाते हैं, जिन्हें शरीर अवशोषित कर सकता है। मनुष्य में पाचन पाचन तंत्र में होता है, जिसमें मुख्य घटक हैं- मुँह, ग्रासनली, आमाशय, छोटी आंत, बड़ी आंत तथा यकृत, अग्न्याशय और लार ग्रंथियाँ जैसे सहायक अंग। पाचन में एंजाइम की मुख्य भूमिका होती है।
स्वपोषी पोषण (Autotrophic Nutrition): जिस पोषण में जीव अपना भोजन स्वयं सरल अकार्बनिक पदार्थों से बनाते हैं, उसे स्वपोषी पोषण कहते हैं। हरे पादप प्रकाश संश्लेषण द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड और जल से ग्लूकोज बनाते हैं। इसमें दो प्रकार हैं:
विषमपोषी पोषण (Heterotrophic Nutrition): जिस पोषण में जीव अन्य जीवों से भोजन प्राप्त करते हैं, उसे विषमपोषी पोषण कहते हैं। इसके प्रकार हैं:
पोषण की विधियाँ: अमीबा फागोसाइटोसिस से भोजन लेता है, मनुष्य मुँह से सम्पूर्ण भोजन (होलोजोइक) ग्रहण करता है।
मानव पाचन तंत्र एक लंबी नली है, जिसे पाचन नली (Alimentary Canal) कहते हैं। यह मुँह से शुरू होकर गुदा (एनस) तक जाती है। इसके मुख्य भाग हैं:
यकृत (Liver): यह शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है। यह पित्त रस स्रावित करता है, जो वसा का पायसीकरण (छोटे-छोटे कणों में विभाजन) करता है। पित्त में पाचक एंजाइम नहीं होता। पित्त पित्ताशय में संचित रहता है। यकृत में पाचक एंजाइम नहीं बनता, परंतु यह यूरिया, प्लाज्मा प्रोटीन, कोलेस्ट्रॉल बनाता है तथा ग्लाइकोजन संग्रहित करता है।
अग्न्याशय (Pancreas): यह दोहरे कार्य करने वाली ग्रंथि है। इसका पाचक (एक्सोक्राइन) भाग अग्नाशयी रस स्रावित करता है, जिसमें ट्रिप्सिन (प्रोटीन→पेप्टाइड), लाइपेज़ (वसा→वसीय अम्ल+ग्लिसरॉल), एमाइलेज़ (स्टार्च→माल्टोज़) जैसे एंजाइम होते हैं। इसका अंतःस्रावी भाग इंसुलिन और ग्लूकागन हार्मोन स्रावित करता है।
पाचक एंजाइम तालिका: टायलिन (लार-स्टार्च), पेप्सिन (आमाशय-प्रोटीन), रेनेट (आमाशय-दूध), ट्रिप्सिन (अग्न्याशय-प्रोटीन), लाइपेज़ (अग्न्याशय-वसा), पित्त (यकृत-वसा का पायसीकरण)।
छोटी आंत का रस: छोटी आंत की दीवार स्थित ग्रंथियाँ आंतों का रस (Intestinal Juice) स्रावित करती हैं, जिसमें सुक्रेज़, माल्टेज़, लैक्टेज़, पेप्टिडेज़ आदि एंजाइम होते हैं। ये अंतिम विघटन करते हैं, जैसे माल्टोज़→ग्लूकोज़, सुक्रोज़→ग्लूकोज़+फ्रक्टोज़, लैक्टोज़→ग्लूकोज़+गैलेक्टोज़।
| प्रकार | विशेषता | उदाहरण |
|---|---|---|
| स्वपोषी | स्वयं भोजन बनाना | हरे पादप |
| मृतजीवी | मृत पदार्थ से पोषण | मशरूम |
| परजीवी | पोषक से भोजन | टेपवर्म |
| कीटभक्षी | कीटों को पचाना | पिचर प्लांट |
| सहजीवी | सहयोगी पोषण | लाइकेन |
| अंग | स्राव | कार्य |
|---|---|---|
| लार ग्रंथि | लार (टायलिन) | स्टार्च → माल्टोज़ |
| आमाशय | गैस्ट्रिक रस (पेप्सिन, HCl) | प्रोटीन → पेप्टोन |
| यकृत | पित्त रस | वसा का पायसीकरण |
| अग्न्याशय | अग्नाशयी रस | प्रोटीन, वसा, स्टार्च का पाचन |
| छोटी आंत | आंतों का रस | अंतिम पाचन और अवशोषण |
flowchart TD
A[17.6 पोषण और पाचन] --> B[पोषण के प्रकार]
A --> C[मानव पाचन तंत्र]
B --> B1[स्वपोषी]
B --> B2[विषमपोषी]
C --> C1[मुँह लार टायलिन]
C --> C2[आमाशय पेप्सिन]
C --> C3[छोटी आंत विल्ली]
C --> C4[यकृत पित्त]
C --> C5[अग्न्याशय एंजाइम]
C3 --> C31[अवशोषण]
C2 --> C21[प्रोटीन पाचन]
B2 --> B21[मृतजीवी]
B2 --> B22[परजीवी]
पोषण और पाचन जीवन की मूलभूत प्रक्रियाएँ हैं। स्वपोषी जीव स्वयं भोजन बनाते हैं जबकि विषमपोषी जीव अन्य स्रोतों से भोजन प्राप्त करते हैं। मानव में पाचन मुँह से गुदा तक की नली में विभिन्न एंजाइमों की सहायता से होता है, जिसमें लार, गैस्ट्रिक रस, अग्नाशयी रस, पित्त तथा आंतों का रस मुख्य भूमिका निभाते हैं। छोटी आंत पाचन और अवशोषण का केंद्र है। परीक्षा की दृष्टि से एंजाइमों के कार्य, पाचन अंगों के स्थान तथा पोषण के प्रकारों का स्पष्ट ज्ञान अत्यंत आवश्यक है।