विषय: रेलवे ग्रुप D – जीव विज्ञान (कोशिका ऊतक और जीवन प्रक्रियाएँ) अध्याय: 17.10 उत्सर्जन विषय-वस्तु: उत्सर्जी अंग, मानव उत्सर्जन
जीवन प्रक्रियाओं के दौरान कोशिकाओं में अनेक अपशिष्ट पदार्थ उत्पन्न होते हैं। यदि ये अपशिष्ट शरीर में एकत्रित हो जाएँ तो कोशिकाओं को हानि पहुँच सकती है। इसलिए जीवों को इन अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालना आवश्यक होता है। जिस प्रक्रिया द्वारा जीव अपने चयापचय के अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालते हैं, उसे उत्सर्जन (Excretion) कहते हैं। मानव में मुख्य उत्सर्जी अपशिष्ट यूरिया है, जो प्रोटीन चयापचय से बनता है।
उत्सर्जन और विसर्जन (Egestion) में अंतर होता है। विसर्जन वह प्रक्रिया है जिसमें अपचित भोजन का मल (Faeces) शरीर से बाहर निकाला जाता है, जबकि उत्सर्जन चयापचय के रासायनिक अपशिष्ट को बाहर निकालने की प्रक्रिया है। उत्सर्जन जैविक प्रक्रिया है जबकि विसर्जन पाचन का अंतिम चरण है। परीक्षा में इन दोनों के अंतर से संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
मानव शरीर के मुख्य उत्सर्जी अंग हैं- वृक्क (Kidney), यकृत, त्वचा, फेफड़े। इनमें वृक्क मुख्य उत्सर्जी अंग है जो मूत्र का निर्माण करता है। यकृत यूरिया बनाता है, त्वचा पसीने के रूप में अपशिष्ट निकालती है तथा फेफड़े कार्बन डाइऑक्साइड निकालते हैं। इस अध्याय में उत्सर्जी अंगों और मानव उत्सर्जन तंत्र का विस्तार से अध्ययन किया जाएगा।
वृक्क (Kidney): वृक्क मानव का मुख्य उत्सर्जी अंग है। मनुष्य में दो वृक्क होते हैं, जो उदर गुहा में मेरु रज्जु के दोनों ओर स्थित होते हैं। प्रत्येक वृक्क का आकार लगभग मुट्ठी जितना तथा रंग लाल-भूरा होता है। वृक्क की कार्यात्मक इकाई नेफ्रॉन है। वृक्क की आंतरिक सतह पर उपस्थित तरंग जैसी परत 'पेल्विस' कहलाती है। प्रत्येक वृक्क में लगभग दस लाख नेफ्रॉन होते हैं। वृक्क निम्न कार्य करता है:
यकृत (Liver): यह शरीर में यूरिया का संश्लेषण करता है। अमोनिया विषैला होता है, इसलिए यकृत उसे यूरिया में बदलकर रक्त में भेजता है। यकृत पित्त के साथ अपशिष्ट वर्णक भी निकालता है। यह उत्सर्जन में सहायक अंग है।
त्वचा (Skin): त्वचा की पसीना ग्रंथियाँ (Sweat Glands) पसीने के रूप में जल, यूरिया और लवण बाहर निकालती हैं। पसीना शरीर को ठंडा भी करता है। यह उत्सर्जन का सहायक अंग है।
फेफड़े (Lungs): फेफड़े श्वसन के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प को शरीर से बाहर निकालते हैं। यह भी उत्सर्जन का सहायक अंग है।
अन्य जीवों में उत्सर्जी अंग:
मानव उत्सर्जन तंत्र (मूत्र तंत्र) के प्रमुख अंग हैं- वृक्क, मूत्रवाहिनी (Ureter), मूत्राशय (Urinary Bladder) और मूत्रमार्ग (Urethra)।
नेफ्रॉन की संरचना: नेफ्रॉन दो मुख्य भागों से बना होता है- वृक्क कणिका (Renal Corpuscle) और वृक्क नलिका (Renal Tubule)।
मूत्र निर्माण की प्रक्रिया:
अंत में बनने वाला मूत्र संग्रह नलिकाओं से होकर वृक्क पेल्विस में जाता है, फिर मूत्रवाहिनी द्वारा मूत्राशय में संचित होता है तथा मूत्रमार्ग से बाहर निकलता है। मनुष्य प्रतिदिन लगभग 1 से 1.8 लीटर मूत्र बनाता है।
मूत्र की संरचना: मूत्र में लगभग 96 प्रतिशत जल तथा यूरिया, यूरिक अम्ल, क्रिएटिनिन और लवण होते हैं।
मूत्र तंत्र के रोग:
महत्वपूर्ण तथ्य:
उत्सर्जन का महत्व: उत्सर्जन से रक्त शुद्ध रहता है, जल और इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बना रहता है तथा शरीर विषैले पदार्थों से मुक्त रहता है। यदि उत्सर्जन रुक जाए तो कुछ ही दिनों में मृत्यु हो सकती है।
| जीव | उत्सर्जी अंग |
|---|---|
| मनुष्य | वृक्क |
| अमीबा | कांट्रैक्टाइल रिक्तिका |
| कीट | माल्पीघी नलिकाएँ |
| केंचुआ | नेफ्रीडिया |
| क्रस्टेशियन | हरी ग्रंथियाँ |
| अंग | कार्य |
|---|---|
| वृक्क | मूत्र का निर्माण |
| मूत्रवाहिनी | मूत्र का वृक्क से मूत्राशय तक परिवहन |
| मूत्राशय | मूत्र का संचय |
| मूत्रमार्ग | मूत्र का शरीर से बाहर निकालना |
flowchart TD
A[17.10 उत्सर्जन] --> B[उत्सर्जी अंग]
A --> C[मानव उत्सर्जन तंत्र]
B --> B1[वृक्क]
B --> B2[यकृत]
B --> B3[त्वचा]
B --> B4[फेफड़े]
C --> C1[वृक्क]
C --> C2[मूत्रवाहिनी]
C --> C3[मूत्राशय]
C --> C4[मूत्रमार्ग]
B1 --> B11[नेफ्रॉन]
B11 --> B111[निस्पंदन]
B11 --> B112[पुनः अवशोषण]
B1 --> B12[यूरिया निष्कासन]
उत्सर्जन शरीर के आंतरिक वातावरण को स्वच्छ और संतुलित रखने की आवश्यक प्रक्रिया है। मानव में वृक्क मुख्य उत्सर्जी अंग है, जो नेफ्रॉन की सहायता से रक्त छानकर यूरिया युक्त मूत्र बनाता है। यकृत यूरिया का निर्माण करता है जबकि त्वचा और फेफड़े अन्य अपशिष्ट बाहर निकालते हैं। मूत्र निर्माण की प्रक्रिया- निस्पंदन, पुनः अवशोषण और स्राव- की समझ परीक्षा के लिए आवश्यक है। विभिन्न जीवों के उत्सर्जी अंगों और उत्सर्जन से जुड़े रोगों का ज्ञान भी ग्रुप D परीक्षा में उपयोगी सिद्ध होता है।