18.5 लैंगिक जनन Notes

18.5 लैंगिक जनन

विषय: रेलवे ग्रुप D – जीव विज्ञान (नियंत्रण जनन और आनुवंशिकता) अध्याय: 18.5 लैंगिक जनन विषय-वस्तु: पुष्पीय जनन, युग्मक

1. परिचय

लैंगिक जनन जनन की वह विधि है जिसमें दो विभिन्न लिंगों के युग्मक (gametes) — नर युग्मक और मादा युग्मक — आपस में संलयन करके नया जीव उत्पन्न करते हैं। यह अलैंगिक जनन से अधिक उन्नत विधि है क्योंकि इसमें दो जनकों की आनुवंशिक सामग्री मिलती है, जिससे संतति में विभिन्नता उत्पन्न होती है। यह विभिन्नता ही विकास और प्राकृतिक चयन का आधार बनती है। लैंगिक जनन में नर युग्मक (पुरुषों में शुक्राणु) तथा मादा युग्मक (स्त्रियों में अंडाणु) का संलयन निषेचन कहलाता है, जिससे युग्मनज (zygote) बनता है।

पादपों में लैंगिक जनन का प्रमुख अंग पुष्प (flower) है। पुष्प जनन के लिए विशेषीकृत संरचना है, जिसमें नर जनन अंग पुंकेसर और मादा जनन अंग स्त्रीकेसर पाए जाते हैं। परागकण परागकोश से स्त्रीकेसर के वर्तिकाग्र तक पहुँचने की प्रक्रिया परागण कहलाती है। परागण के बाद ही निषेचन संभव होता है। परागण वायु, जल, कीट, पक्षी आदि माध्यमों से होता है, इसलिए इसे परागण माध्यम कहते हैं। इस अध्याय में पुष्प की संरचना, परागण के प्रकार तथा युग्मकों की भूमिका का विस्तार से अध्ययन किया जाएगा।

लैंगिक जनन की सार्वभौमिकता का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह एकल-कोशिकीय शैवाल से लेकर मनुष्य तक सभी उच्च जीवों में पाया जाता है। जंतुओं में नर और मादा जनन अंग पृथक जीवों में होते हैं, जबकि पादपों में कई बार एक ही पुष्प में दोनों अंग पाए जाते हैं, इसे द्विलिंगी पुष्प कहते हैं। युग्मक कोशिकाएँ अर्धसूत्री विभाजन (meiosis) द्वारा बनती हैं, इसलिए इनमें गुणसूत्रों की संख्या आधी (n) होती है। यह तथ्य आनुवंशिकता के अध्याय से जुड़ा है और परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

2. पुष्प की संरचना और जनन अंग

पुष्प लैंगिक जनन का मुख्य अंग है। एक पूर्ण पुष्प में निम्न भाग होते हैं:

पुंकेसर द्वारा बने परागकण को वर्तिकाग्र तक ले जाने की प्रक्रिया परागण है। परागण के बाद परागकण से पराग नलिका विकसित होती है, जो वर्तिका होते हुए अंडाशय में बीजांड तक पहुँचती है। पराग नलिका के माध्यम से नर युग्मक बीजांड में पहुँचकर मादा युग्मक से संलयन करता है। इसी संलयन को निषेचन कहते हैं। उदाहरण के लिए:

  1. परागकण वर्तिकाग्र पर पहुँचता है।
  2. पराग नलिका वर्तिका से होकर अंडाशय में प्रवेश करती है।
  3. नर युग्मक बीजांड के मादा युग्मक से मिलकर युग्मनज बनाता है।

अंडाशय बाद में फल में तथा बीजांड बीज में विकसित होते हैं। इस प्रकार पुष्प का प्रत्येक भाग जनन प्रक्रिया में निश्चित भूमिका निभाता है।

3. परागण के प्रकार और माध्यम

परागण दो प्रकार का होता है:

परागण के माध्यम (agents) निम्न हैं:

परागण और निषेचन में अंतर समझना आवश्यक है। परागण परागकण का वर्तिकाग्र तक पहुँचना है, जबकि निषेचन नर और मादा युग्मकों का संलयन है। परागण निषेचन से पहले होता है। यदि परागण न हो तो निषेचन असंभव है। उदाहरण के लिए:

  1. मक्का में वायु परागण से परागकण वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं।
  2. वहाँ पराग नलिका विकसित होती है।
  3. युग्मक संलयन (निषेचन) से बीज बनते हैं।

इस प्रकार परागण सफल जनन की पहली सीढ़ी है।

4. युग्मक और निषेचन की प्रक्रिया

युग्मक विशेष जनन कोशिकाएँ हैं, जो अर्धसूत्री विभाजन (meiosis) द्वारा बनती हैं और गुणसूत्रों की आधी (अगुणित, n) संख्या लेकर चलती हैं। नर युग्मक — शुक्राणु/परागकण का नर केंद्रक, तथा मादा युग्मक — अंडाणु। जंतुओं में शुक्राणु छोटे, गतिशील तथा अनेक संख्या में होते हैं, जबकि अंडाणु बड़ा, स्थिर तथा कम संख्या में होता है। युग्मकों के संलयन (निषेचन) से युग्मनज (zygote) बनता है, जिसमें गुणसूत्रों की संख्या पुनः पूर्ण (द्विगुणित, 2n) हो जाती है।

पादपों में निषेचन के बाद बीजांड बीज में तथा अंडाशय फल में बदल जाता है। बीज के अंकुरण से नया पौधा विकसित होता है। बीज और फल संतति के प्रसार में सहायक होते हैं, क्योंकि ये विभिन्न माध्यमों (वायु, जल, जंतु) से दूर-दूर तक फैलते हैं। उदाहरण के लिए:

  1. निषेचन से युग्मनज बनता है।
  2. बीजांड बीज और अंडाशय फल में विकसित होता है।
  3. बीज अंकुरण से नया पौधा बनता है।

लैंगिक जनन की संतति में आनुवंशिक विभिन्नता होती है, जो विकास के लिए आवश्यक है। कुछ जीवों में नर और मादा अंग एक ही जीव में होते हैं, इसे उभयलिंगी (hermaphrodite) कहते हैं, जैसे केंचुआ, जोंक। पादपों में द्विलिंगी पुष्प इसी का उदाहरण है। जिन पौधों के नर और मादा पुष्प अलग-अलग पौधों पर होते हैं, वे एकलिंगी या द्विअंगी कहलाते हैं, जैसे पपीता। इस प्रकार युग्मकों की संरचना और संलयन ही लैंगिक जनन का मूल है।

5. त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: पुष्प के जनन अंग

अंग भाग कार्य
पुंकेसर (नर) परागकोश परागकण बनाना
पुंकेसर (नर) तंतु परागकोश को सहारा देना
स्त्रीकेसर (मादा) वर्तिकाग्र परागकण ग्रहण करना
स्त्रीकेसर (मादा) वर्तिका पराग नलिका का मार्ग
स्त्रीकेसर (मादा) अंडाशय बीजांड धारण करना

तालिका 2: परागण के प्रकार और माध्यम

प्रकार/माध्यम विशेषता उदाहरण
स्वपरागण उसी पुष्प/पौधे में मटर, बैंगन
परपरागण दूसरे पौधे में अधिकांश पुष्पीय पौधे
वायु परागण हल्के परागकण मक्का, गेहूँ, घास
कीट परागण सुगंधित/रंगीन दल सूरजमुखी, सरसों
जल परागण जलीय पौधे वैलिस्नेरिया

6. माइंड मैप

flowchart TD
    A[18.5 लैंगिक जनन] --> B[पुष्प की संरचना]
    A --> C[परागण]
    A --> D[निषेचन]
    A --> E[युग्मक]
    B --> B1[पुंकेसर - नर अंग]
    B --> B2[स्त्रीकेसर - मादा अंग]
    B1 --> B11[परागकोश]
    B1 --> B12[तंतु]
    B2 --> B21[वर्तिकाग्र]
    B2 --> B22[वर्तिका]
    B2 --> B23[अंडाशय]
    C --> C1[स्वपरागण]
    C --> C2[परपरागण]
    C --> C3[माध्यम - वायु, कीट, जल]
    D --> D1[नर युग्मक + मादा युग्मक]
    D1 --> D2[युग्मनज]
    E --> E1[शुक्राणु - n]
    E --> E2[अंडाणु - n]

7. महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

<svg viewBox="0 0 800 600" xmlns="http://www.w3.org/2000/svg" font-family="Arial, sans-serif">
<rect width="800" height="600" fill="#ffffff"/>
<text x="400" y="40" text-anchor="middle" font-size="26" font-weight="bold" fill="#1a237e">पुष्प के जनन अंग</text>
<circle cx="400" cy="200" r="60" fill="#fff9c4" stroke="#b8860b" stroke-width="3"/>
<text x="400" y="196" text-anchor="middle" font-size="14" fill="#000">वर्तिकाग्र</text>
<text x="400" y="214" text-anchor="middle" font-size="12" fill="#000">(पराग ग्रहण)</text>
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<text x="365" y="315" text-anchor="middle" font-size="13" fill="#000">वर्तिका</text>
<ellipse cx="400" cy="390" rx="70" ry="40" fill="#e3f2fd" stroke="#1565c0" stroke-width="3"/>
<text x="400" y="386" text-anchor="middle" font-size="13" fill="#000">अंडाशय</text>
<text x="400" y="406" text-anchor="middle" font-size="11" fill="#555">बीजांड</text>
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<circle cx="270" cy="200" r="16" fill="#ffcc80" stroke="#e65100" stroke-width="2"/>
<text x="240" y="185" text-anchor="middle" font-size="12" fill="#000">परागकण</text>
<line x1="290" y1="220" x2="330" y2="270" stroke="#e65100" stroke-width="3"/>
<text x="255" y="270" text-anchor="middle" font-size="13" fill="#000">पुंकेसर</text>
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<text x="70" y="566" font-size="15" fill="#000">स्वर्ण नियम: पुंकेसर नर जनन अंग और स्त्रीकेसर मादा जनन अंग है।</text>
</svg>
<svg viewBox="0 0 800 600" xmlns="http://www.w3.org/2000/svg" font-family="Arial, sans-serif">
<rect width="800" height="600" fill="#ffffff"/>
<text x="400" y="40" text-anchor="middle" font-size="26" font-weight="bold" fill="#1a237e">परागण से निषेचन तक</text>
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<text x="160" y="152" text-anchor="middle" font-size="15" fill="#000">परागकण</text>
<text x="160" y="172" text-anchor="middle" font-size="12" fill="#555">परागकोश से</text>
<line x1="260" y1="155" x2="340" y2="155" stroke="#1565c0" stroke-width="3"/>
<text x="300" y="143" text-anchor="middle" font-size="12" fill="#000">परागण</text>
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<text x="440" y="152" text-anchor="middle" font-size="15" fill="#000">वर्तिकाग्र पर आगमन</text>
<text x="440" y="172" text-anchor="middle" font-size="12" fill="#555">पराग नलिका बनती है</text>
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<text x="580" y="143" text-anchor="middle" font-size="12" fill="#000">वर्तिका में</text>
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<text x="695" y="152" text-anchor="middle" font-size="14" fill="#000">निषेचन</text>
<text x="695" y="172" text-anchor="middle" font-size="12" fill="#555">युग्मनज बनता है</text>
<rect x="60" y="260" width="200" height="70" rx="10" fill="#fce4ec" stroke="#c62828" stroke-width="3"/>
<text x="160" y="292" text-anchor="middle" font-size="14" fill="#000">बीजांड → बीज</text>
<text x="160" y="312" text-anchor="middle" font-size="12" fill="#555">अंडाशय → फल</text>
<line x1="695" y1="190" x2="160" y2="260" stroke="#888" stroke-width="2" stroke-dasharray="6 4"/>
<text x="440" y="350" text-anchor="middle" font-size="13" fill="#555">संतति का प्रसार</text>
<rect x="60" y="540" width="680" height="42" rx="8" fill="#fdf6d8" stroke="#b8860b" stroke-width="2"/>
<text x="70" y="566" font-size="15" fill="#000">स्वर्ण नियम: परागण परागकण का वर्तिकाग्र तक आगमन है, जबकि निषेचन युग्मकों का संलयन है।</text>
</svg>

8. सामान्य गलतियाँ

  1. गलती: परागण और निषेचन को एक ही प्रक्रिया मान लेना; परागण परागकण का स्थानांतरण है, निषेचन युग्मक संलयन है।
  2. गलती: परागकोश को मादा अंग बताना; परागकोश नर अंग (पुंकेसर) का भाग है।
  3. गलती: मटर को परपरागण का उदाहरण मानना; मटर में स्वपरागण होता है।
  4. गलती: युग्मकों में गुणसूत्र संख्या पूर्ण (2n) बताना; युग्मक अगुणित (n) होते हैं।
  5. गलती: वैलिस्नेरिया को कीट परागण से जोड़ना; यह जल परागण का उदाहरण है।
  6. गलती: अंडाशय को बीज में विकसित होना बताना; अंडाशय फल में तथा बीजांड बीज में विकसित होता है।

9. परीक्षा युक्तियाँ

  1. पुंकेसर = परागकोश + तंतु और स्त्रीकेसर = वर्तिकाग्र + वर्तिका + अंडाशय — सूत्र याद रखें।
  2. परागण माध्यम के उदाहरण — वायु (मक्का), कीट (सूरजमुखी), जल (वैलिस्नेरिया) रटें।
  3. स्वपरागण का उदाहरण मटर तथा परपरागण का मक्का-सूरजमुखी याद रखें।
  4. युग्मक (n) और युग्मनज (2n) का अंतर न भूलें।
  5. निषेचन के बाद बीजांड → बीज, अंडाशय → फल का क्रम स्मरण रखें।
  6. द्विलिंगी पुष्प और उभयलिंगी जंतु (केंचुआ) की परिभाषा जानें।

10. निष्कर्ष

लैंगिक जनन दो युग्मकों के संलयन द्वारा संतति उत्पन्न करने की उन्नत विधि है, जिसमें आनुवंशिक विभिन्नता होती है और विकास को गति मिलती है। पुष्प पादपों का जनन अंग है, जिसमें पुंकेसर और स्त्रीकेसर क्रमशः नर एवं मादा युग्मक बनाते हैं। परागण वायु, कीट, जल आदि माध्यमों से होता है और निषेचन में युग्मक संलयन होता है। निषेचन के बाद बीज और फल विकसित होकर संतति का प्रसार सुनिश्चित करते हैं। युग्मकों की अगुणित प्रकृति आनुवंशिकता से जुड़ी होने के कारण आगे के अध्यायों के लिए महत्वपूर्ण आधार है।