विषय: रेलवे ग्रुप D – भौतिकी (ऊष्मा ध्वनि और प्रकाश) अध्याय: 12.8 दर्पण विषय-वस्तु: समतल-गोलीय दर्पण, प्रतिबिम्ब
दर्पण वह चमकदार सतह है जो प्रकाश का नियमित परावर्तन करके स्पष्ट प्रतिबिम्ब बनाती है। दर्पण मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं – समतल दर्पण, अवतल (concave) दर्पण और उत्तल (convex) दर्पण। समतल दर्पण की सतह सपाट होती है और उसमें प्रतिबिम्ब वस्तु के आकार का बनता है। अवतल दर्पण की परावर्तक सतह अंदर की ओर धँसी होती है, जबकि उत्तल दर्पण की परावर्तक सतह बाहर की ओर उभरी होती है। अवतल दर्पण को अभिसारी (converging) दर्पण और उत्तल दर्पण को अपसारी (diverging) दर्पण भी कहते हैं। दर्पण के महत्वपूर्ण पद हैं – ध्रुव (pole), मुख्य अक्ष (principal axis), फोकस (focus), वक्रता केंद्र (centre of curvature) और फोकस दूरी (focal length)।
अवतल दर्पण का उपयोग दाढ़ी बनाने के दर्पण, सर्जन के सिर के लैंप, टार्च, हेडलाइट और टेलीस्कोप के परावर्तक में होता है। उत्तल दर्पण का उपयोग वाहनों के साइड मिरर, दुकानों के सुरक्षा दर्पण और आँख मोड़ वाले स्थानों पर किया जाता है, क्योंकि उत्तल दर्पण में सीधा परंतु छोटा प्रतिबिम्ब बनता है जिससे पीछे का अधिक क्षेत्र दिखाई देता है। वाहनों में लगा उत्तल दर्पण चालक को पीछे की वस्तुएँ सीधी और छोटी दिखाता है, जिससे सुरक्षित वाहन चलाना संभव होता है।
गोलीय दर्पणों के लिए दर्पण सूत्र (mirror formula) लागू होता है: 1/f = 1/v + 1/u, जहाँ f फोकस दूरी, v प्रतिबिम्ब की दूरी और u वस्तु की दूरी है। आवर्धन (magnification) m = −v/u होता है। फोकस दूरी का वक्रता त्रिज्या (R) से संबंध f = R/2 होता है। अवतल दर्पण की फोकस दूरी और वक्रता त्रिज्या ऋणात्मक होती है, जबकि उत्तल दर्पण की धनात्मक होती है (चिह्न परिपाटी के अनुसार)। रेलवे ग्रुप D परीक्षा में दर्पण के प्रकार, उनके उपयोग और दर्पण सूत्र पर आधारित संख्यात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं।
गोलीय दर्पणों के बारे में जानने से पहले उनके प्रकार और पदों को समझना आवश्यक है।
उदाहरण 1: एक अवतल दर्पण की वक्रता त्रिज्या 40 सेंटीमीटर है। फोकस दूरी ज्ञात कीजिए। हल: f = R/2 = 40/2 = 20 सेंटीमीटर। उदाहरण 2: यदि फोकस दूरी 15 सेंटीमीटर हो तो वक्रता त्रिज्या क्या होगी? हल: R = 2f = 2 × 15 = 30 सेंटीमीटर।
अवतल और उत्तल दर्पणों में प्रतिबिम्ब की प्रकृति वस्तु की स्थिति पर निर्भर करती है।
उदाहरण 3: 20 सेंटीमीटर फोकस दूरी वाले अवतल दर्पण में वस्तु 60 सेंटीमीटर दूर रखी है। प्रतिबिम्ब की दूरी ज्ञात कीजिए। हल: 1/f = 1/v + 1/u → 1/(−20) = 1/v + 1/(−60) → 1/v = −1/20 + 1/60 = (−3+1)/60 = −2/60 = −1/30 → v = −30 सेंटीमीटर (वास्तविक प्रतिबिम्ब)।
उदाहरण 4: एक उत्तल दर्पण की फोकस दूरी 30 सेंटीमीटर है और वस्तु 60 सेंटीमीटर दूर रखी है। प्रतिबिम्ब की दूरी ज्ञात कीजिए। हल: 1/f = 1/v + 1/u → 1/30 = 1/v + 1/(−60) → 1/v = 1/30 + 1/60 = 3/60 = 1/20 → v = +20 सेंटीमीटर (आभासी प्रतिबिम्ब)।
दर्पणों के व्यावहारिक उपयोग परीक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं।
उदाहरण 5: वाहनों में साइड मिरर उत्तल क्यों होता है? हल: उत्तल दर्पण में सीधा और छोटा प्रतिबिम्ब बनता है, जिससे पीछे का अधिक क्षेत्र एक साथ दिखाई देता है, इसलिए यह सुरक्षित होता है। उदाहरण 6: सौर भट्टी में किस दर्पण का प्रयोग होता है? हल: अवतल दर्पण, क्योंकि यह सूर्य की किरणों को एक बिंदु (फोकस) पर केंद्रित करता है।
| विशेषता | अवतल दर्पण | उत्तल दर्पण |
|---|---|---|
| परावर्तक सतह | अंदर धँसी | बाहर उभरी |
| प्रकार | अभिसारी | अपसारी |
| प्रतिबिम्ब | वास्तविक/आभासी | सदैव आभासी, सीधा, छोटा |
| फोकस दूरी | ऋणात्मक | धनात्मक |
| उपयोग | शेविंग, हेडलाइट | साइड मिरर |
| सूत्र/पद | मान |
|---|---|
| दर्पण सूत्र | 1/f = 1/v + 1/u |
| आवर्धन | m = −v/u |
| फोकस दूरी | f = R/2 |
| वक्रता त्रिज्या | R = 2f |
flowchart TD
A[दर्पण] --> B[समतल दर्पण]
A --> C[गोलीय दर्पण]
C --> D[अवतल दर्पण]
C --> E[उत्तल दर्पण]
D --> F[अभिसारी]
D --> G[शेविंग हेडलाइट]
E --> H[अपसारी]
E --> I[साइड मिरर]
A --> J[प्रमुख पद]
J --> K[ध्रुव फोकस]
J --> L[वक्रता केंद्र]
A --> M[सूत्र]
M --> N[1/f = 1/v + 1/u]
M --> O[f = R/2]
A --> P[आवर्धन m = -v/u]
दर्पण चमकदार सतह होते हैं जो प्रकाश का नियमित परावर्तन करते हैं, और तीन प्रकार के होते हैं – समतल, अवतल और उत्तल। अवतल दर्पण अभिसारी होता है जिसका उपयोग शेविंग मिरर, टार्च, हेडलाइट और सौर भट्टी में होता है, जबकि उत्तल दर्पण अपसारी होता है जिसका उपयोग वाहनों के साइड मिरर और सुरक्षा दर्पण में होता है। दर्पण सूत्र 1/f = 1/v + 1/u और f = R/2 तथा आवर्धन m = −v/u संख्यात्मक प्रश्नों के आधार हैं। रेलवे ग्रुप D परीक्षा में दर्पण के प्रकार, उपयोग और सूत्रों पर प्रश्न पूछे जाते हैं। इस अध्याय की समझ अपवर्तन और लेंस जैसे आगे के विषयों को सीखने का आधार है।