विषय: रेलवे NTPC – सामान्य जागरूकता (प्राचीन भारतीय इतिहास) अध्याय: 11.1 सिंधु घाटी सभ्यता विषय-वस्तु: हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, नगर योजना
सिंधु घाटी सभ्यता भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन नगरीय सभ्यता है, जो लगभग 2500 ईसा पूर्व से 1500 ईसा पूर्व तक सिंधु तथा घग्गर-हकड़ा नदियों के क्षेत्रों में फैली रही। इसे 'हड़प्पा सभ्यता' के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इसका पहला उत्खनन हड़प्पा (मोंटगोमरी जिला, पंजाब, पाकिस्तान) स्थल पर हुआ था। यह सभ्यता ताम्र-पाषाण युग की सबसे विकसित नगरीय सभ्यताओं में गिनी जाती है, जो मिस्र तथा मेसोपोटामिया की सभ्यताओं के समकालीन थी।
इस सभ्यता की खोज की कहानी रोचक है। सन 1853 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी के समय में हड़प्पा स्थल पर ईंटों के भट्ठे बने, जिससे सभ्यता के अवशेषों को नुकसान पहुँचा। सन 1921 ईस्वी में दयाराम साहनी ने हड़प्पा की खोज की तथा 1922 ईस्वी में राखालदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो की। सन 1924 ईस्वी में तत्कालीन पुरातत्व महानिदेशक सर जॉन मार्शल ने इन दोनों स्थलों के अवशेषों को सिंधु घाटी सभ्यता के रूप में विश्व के समक्ष घोषित किया।
यह सभ्यता अपनी उन्नत नगर योजना, सुनियोजित जल निकासी, मुहरों, पत्थर व कांस्य की मूर्तियों, लिपि तथा विदेशी व्यापार के लिए विश्व प्रसिद्ध है। नगरों की सड़कें सीधी एवं एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। पुरातत्वविद् सर जॉन मार्शल ने इस सभ्यता के लोगों को 'किसी नीति-कुशल शासन के अधीन विकसित सुसंगठित समाज' की संज्ञा दी। सभ्यता के लोग ताँबा, कांस्य, पत्थर तथा मिट्टी के बर्तनों का उपयोग करते थे, जबकि लोहे का प्रयोग उन्हें ज्ञात नहीं था।
हड़प्पा स्थल रावी नदी के किनारे स्थित है और इसी नाम पर इस सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता कहा जाता है। सन 1921 ईस्वी में दयाराम साहनी ने यहाँ उत्खनन प्रारंभ किया। हड़प्पा के प्रमुख अवशेषों में ईंटों से बना गढ़ (सिटाडेल), विशाल अन्नागार, ईंटों का चबूतरा (प्लेटफॉर्म), लकड़ी का ताबूत तथा पुरुष की लाल बलुआ पत्थर की पुट्ठा (धड़) मूर्ति शामिल हैं।
हड़प्पा स्थल की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
नमूना प्रश्न (उदाहरण): सभ्यता का नाम हड़प्पा किस स्थल के आधार पर पड़ा? (1) रावी नदी किनारे स्थित हड़प्पा (2) सिंधु नदी किनारे स्थित मोहनजोदड़ो (3) घग्गर नदी किनारे स्थित कालीबंगा (4) भोगवा नदी किनारे स्थित लोथल। सही उत्तर (1) है।
मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ है 'मृतकों का टीला' (Mound of the Dead)। यह स्थल सिंधु नदी के किनारे स्थित है तथा इसकी खोज 1922 ईस्वी में राखालदास बनर्जी ने की। यह सभ्यता का सबसे बड़ा तथा सबसे महत्वपूर्ण नगर माना जाता है। पूरे नगर को दो भागों में बाँटा गया था – पश्चिम की ओर ऊँचा 'गढ़' तथा पूर्व की ओर निचला नगर। मोहनजोदड़ो को 'नगर योजना का अद्भुत नमूना' कहा जाता है।
मोहनजोदड़ो से मिले प्रमुख अवशेष इस प्रकार हैं:
नमूना उदाहरण (numbered): (1) महास्नानागार की खोज जे.एफ. मार्शल ने की। (2) कांस्य की नर्तकी की मूर्ति मोहनजोदड़ो से ही मिली है। (3) पशुपति मुहर को जॉन मार्शल ने खोजा। (4) यहाँ का शासन-तंत्र पुरोहित वर्ग के हाथ में रहा होगा।
सिंधु घाटी सभ्यता की नगर योजना विश्व की सबसे उन्नत नगर योजनाओं में से एक है। नगरों को ग्रिड (जाली) पैटर्न पर बनाया गया था। सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं, जिससे शहर मोहल्लों (ब्लॉक) में बँट जाता था। प्रत्येक नगर को दो भागों में विभाजित किया गया था – ऊपरी नगर (गढ़) जहाँ प्रशासनिक और धार्मिक भवन स्थित थे तथा निचला नगर जहाँ आम नागरिकों के आवास थे। कच्ची तथा पक्की दोनों प्रकार की ईंटों का उपयोग होता था, परंतु ईंटों का अनुपात (1:2:4) सर्वत्र एक समान था।
नगर योजना की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
उदाहरण (numbered): (1) बनावली (हरियाणा) से जौ एवं 'सवार आदमी की मुहर' मिली। (2) धोलावीरा से जल संचयन व्यवस्था मिली। (3) सुरकोटदा से घोड़े की अस्थियाँ मिलीं। (4) राखीगढ़ी भारत का सबसे बड़ा हड़प्पा स्थल है। (5) दैमाबाद (महाराष्ट्र) से सूती वस्त्र का प्रमाण मिला।
| पुरास्थल | नदी/राज्य | प्रमुख अवशेष |
|---|---|---|
| हड़प्पा | रावी (पंजाब) | अन्नागार, ताबूत, पुरुष धड़ मूर्ति |
| मोहनजोदड़ो | सिंधु (सिंध) | महास्नानागार, कांस्य नर्तकी, पशुपति मुहर, दाढ़ी वाला पुरुष |
| लोथल | भोगवा (गुजरात) | विश्व का प्राचीनतम डॉकयार्ड, अग्नि-वेदियाँ |
| धोलावीरा | गुजरात (कच्छ) | जल संचयन, स्टेडियम, विशाल जलाशय |
| कालीबंगा | घग्गर (राजस्थान) | हल, अग्नि-वेदियाँ, ईंटों का चबूतरा |
| बनावली | हरियाणा | जौ, सवार आदमी की मुहर |
| राखीगढ़ी | हरियाणा | भारत का सबसे बड़ा स्थल, कब्जों वाली दीवारें |
| चन्हूदड़ो | सिंधु | मनके बनाने की कार्यशाला, गढ़ रहित नगर |
| सुरकोटदा | गुजरात | अश्व (घोड़े) की अस्थियाँ |
| दैमाबाद | महाराष्ट्र | सूती वस्त्र, ताँबे का रथ |
| वर्ष/काल | घटना |
|---|---|
| 2500–1500 ई.पू. | सभ्यता का परिपक्व काल |
| 1853 ई. | हड़प्पा स्थल पर ईंटें निकालना (कनिंघम की सूचना) |
| 1921 ई. | दयाराम साहनी द्वारा हड़प्पा की खोज |
| 1922 ई. | राखालदास बनर्जी द्वारा मोहनजोदड़ो की खोज |
| 1924 ई. | सर जॉन मार्शल द्वारा सभ्यता की घोषणा |
| 1946 ई. | मोर्टिमर व्हीलर द्वारा हड़प्पा की पुनः खुदाई |
| 1960 ई. | कालीबंगा की खोज (अमलानंद घोष) |
| 1985 ई. | धोलावीरा की खोज (जे.पी. जोशी) |
flowchart TD
A[सिंधु घाटी सभ्यता] --> B[हड़प्पा]
A --> C[मोहनजोदड़ो]
A --> D[नगर योजना]
B --> E[रावी नदी पर स्थित]
B --> F[अन्नागार एवं ताबूत]
C --> G[महास्नानागार]
C --> H[पशुपति मुहर]
C --> I[कांस्य नर्तकी]
D --> J[ग्रिड पैटर्न सड़कें]
D --> K[गढ़ एवं निचला नगर]
D --> L[ढकी नालियाँ]
A --> M[खोज: साहनी व बनर्जी]
A --> N[घोषणा: जॉन मार्शल]
सिंधु घाटी सभ्यता भारतीय इतिहास की प्राचीनतम नगरीय सभ्यता है, जो अपनी सुनियोजित नगर योजना, जल निकासी व्यवस्था, मुहरों, मूर्तिकला तथा व्यापार के लिए प्रसिद्ध है। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल, धोलावीरा जैसे स्थलों के अवशेष इसकी समृद्धि के साक्षी हैं। रेलवे NTPC परीक्षा में खोजकर्ताओं, वर्षों, स्थलों तथा अवशेषों का मिलान सबसे अधिक पूछा जाता है, अतः इन तथ्यों की त्वरित पुनरावृत्ति कर उम्मीदवार आसानी से अंक प्राप्त कर सकते हैं।