विषय: रेलवे NTPC – सामान्य जागरूकता (मध्यकालीन भारतीय इतिहास) अध्याय: 12.7 मध्यकालीन प्रशासन और अर्थव्यवस्था विषय-वस्तु: इक्ता, जागीर, मंसबदारी, राजस्व
मध्यकालीन भारत में प्रशासन और अर्थव्यवस्था मुख्यतः भूमि और राजस्व पर आधारित थी। दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य दोनों में राज्य की आय का सबसे बड़ा स्रोत भू-राजस्व था, जो उपज के एक निश्चित हिस्से के रूप में वसूला जाता था। सल्तनत काल में इक्ता प्रणाली प्रचलित थी, जिसमें सैनिकों और अमीरों को कर वसूली के बदले भूमि या उसका राजस्व दिया जाता था। मुगल काल में यही व्यवस्था मंसबदारी और जागीरदारी के रूप में विकसित हुई।
अलाउद्दीन खिलजी, मुहम्मद बिन तुगलक और फिरोज शाह तुगलक जैसे सुल्तानों ने राजस्व व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार किए। अलाउद्दीन ने भू-राजस्व आधा करके राजकोष को मजबूत किया, जबकि मुहम्मद बिन तुगलक ने कृषि विभाग दीवान-ए-कोही की स्थापना की। मुगल काल में टोडरमल की ज़ब्ती (दहशला) व्यवस्था के अंतर्गत उपज का एक तिहाई राजस्व लिया जाने लगा। शेर शाह सूरी ने रुपया सिक्का, सड़कों और डाक व्यवस्था के माध्यम से अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया।
रेलवे NTPC परीक्षा में इस अध्याय से इक्ता, जागीर, मंसबदारी और राजस्व व्यवस्थाओं से संबंधित प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं। ज़ात-सवार, ज़ब्ती-दहशला, टंका-जीतल-मोहर-दाम जैसी शब्दावली और विभिन्न करों (जजिया, खम्स, जकात, खराज) की जानकारी परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। राजस्व व्यवस्था के इन तथ्यों को तुलनात्मक रूप से याद रखना इस अध्याय में उच्च अंक दिला सकता है।
इक्ता प्रणाली दिल्ली सल्तनत की प्रमुख भू-राजस्व व्यवस्था थी। इसके अंतर्गत सुल्तान सैनिकों और अमीरों को एक क्षेत्र (इक्ता) सौंपता था, जिससे वे कर वसूलकर अपना वेतन प्राप्त करते थे। इक्ता धारक को इक्तेदार या मुक्ति कहा जाता था। इक्ता प्रणाली को सबसे पहले व्यवस्थित रूप इल्तुतमिश ने दिया। प्रारंभ में इक्ताएँ वंशानुगत होती थीं, परंतु अलाउद्दीन खिलजी ने इन्हें केंद्रीय नियंत्रण में लेकर वंशानुगत अधिकार समाप्त कर दिए।
जागीर प्रणाली मुगल काल में प्रचलित हुई, जिसमें जागीरदार को राज्य की ओर से एक क्षेत्र का राजस्व वसूलने का अधिकार दिया जाता था। जागीरें वंशानुगत नहीं होती थीं और जागीरदार राज्य का प्रतिनिधि होता था। जागीरदार को इंतजामी (प्रशासन) और राजस्व संग्रह का कार्य सौंपा जाता था।
त्वरित तथ्य: इक्ता धारक को मुक्ति कहा जाता था। इल्तुतमिश ने इक्ता को व्यवस्थित किया। अलाउद्दीन ने इक्ता को केंद्रीकृत किया, जबकि फिरोज शाह ने इसे वंशानुगत बनाया।
मंसबदारी प्रणाली अकबर द्वारा स्थापित मुगल सैनिक-प्रशासनिक व्यवस्था थी। इसके अंतर्गत हर अधिकारी (मनसबदार) को ज़ात और सवार के दो पद दिए जाते थे। ज़ात पद व्यक्तिगत पद और वेतन का आधार होता था, जबकि सवार पद उसके अधीन घुड़सवारों की संख्या निर्धारित करता था। मनसबदारों को वेतन के बदले जागीरें दी जाती थीं, जिनसे वे राजस्व वसूलकर अपना खर्च चलाते थे।
त्वरित तथ्य: मंसबदारी में ज़ात-सवार का सिद्धांत मुगल प्रशासन की रीढ़ था। सूबा मुगल साम्राज्य का प्रांत था। कोतवाल नगर का पुलिस अधिकारी होता था।
मुगल काल की सबसे महत्वपूर्ण राजस्व व्यवस्था टोडरमल की ज़ब्ती (दहशला) व्यवस्था थी, जो अकबर के काल में 1580 के आसपास लागू हुई। इसमें भूमि की माप करके उपज का एक तिहाई राजस्व निर्धारित किया जाता था। 'दहशला' शब्द 'दह' (एक तिहाई) और 'शला' (दर) से बना है। किसानों को सहायता देने के लिए सरकार ऋण भी उपलब्ध कराती थी।
त्वरित तथ्य: ज़ब्ती व्यवस्था में उपज का एक तिहाई कर लिया जाता था। सल्तनत काल में अमीर सैन्य सरदार होते थे। फिरोज शाह ने किस्मत (गृह कर) भी लगाया। मध्यकालीन राजस्व का मुख्य उपयोग सेना और प्रशासन के खर्च में होता था।
| कर | किस पर लगता था |
|---|---|
| खराज | भूमि कर |
| जजिया | गैर-मुस्लिमों पर |
| खम्स | युद्ध लूट का हिस्सा |
| जकात | मुस्लिम संपत्ति पर |
| चौथ | राजस्व का चौथाई |
| सरदेशमुखी | राजस्व का दसवाँ भाग |
| पहलू | सल्तनत काल | मुगल काल |
|---|---|---|
| भूमि व्यवस्था | इक्ता प्रणाली | मंसबदारी, जागीरदारी |
| राजस्व दर | आधा (अलाउद्दीन) | एक तिहाई (ज़ब्ती) |
| सिक्के | टंका, जीतल | मोहर, रुपया, दाम |
| राजस्व विभाग | दीवान-ए-मुस्तखराज | दीवान |
| प्रांतीय प्रमुख | मुक्ति/इक्तेदार | सूबेदार |
flowchart TD
A[मध्यकालीन प्रशासन और अर्थव्यवस्था] --> B[सल्तनत काल]
A --> C[मुगल काल]
B --> B1[इक्ता प्रणाली]
B --> B2[दीवान-ए-मुस्तखराज]
B --> B3[चार कर - खराज, जजिया, खम्स, जकात]
B --> B4[दीवान-ए-कोही]
C --> C1[मंसबदारी प्रणाली]
C --> C2[जागीरदारी]
C --> C3[ज़ब्ती दहशला व्यवस्था]
C --> C4[दीवान विभाग]
C3 --> D[टोडरमल एक तिहाई राजस्व]
C --> E[सिक्के - मोहर, रुपया, दाम]
मध्यकालीन प्रशासन और अर्थव्यवस्था की रीढ़ भूमि और उसका राजस्व था। सल्तनत की इक्ता प्रणाली से लेकर मुगल की मंसबदारी-जागीरदारी तक राज्य ने कर वसूली और प्रशासन को केंद्रीकृत किया। टोडरमल की ज़ब्ती व्यवस्था, शेर शाह के रुपया सिक्के और सड़क-डाक तंत्र ने अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी। रेलवे NTPC के लिए करों, सिक्कों, राजस्व दरों और विभागों का तुलनात्मक अभ्यास इस अध्याय में पूर्ण अंक दिला सकता है।