विषय: रेलवे NTPC – सामान्य जागरूकता (आधुनिक भारतीय इतिहास) अध्याय: 13.4 सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन विषय-वस्तु: राजा राममोहन, आर्य समाज
उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलनों की एक महान लहर उठी। इसका मुख्य कारण पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार, ब्रिटिश उपनिवेशवाद के प्रभाव और भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियाँ – सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह पर प्रतिबंध, जाति-पाँति भेदभाव और अंधविश्वास थे। इन आंदोलनों ने भारतीय समाज को आधुनिक बनाने का प्रयास किया, इसलिए इन्हें 'भारतीय पुनर्जागरण' कहा जाता है।
इन सुधार आंदोलनों में सबसे अग्रणी भूमिका राजा राममोहन रॉय की थी, जिन्होंने 'ब्रह्म समाज' की स्थापना की। इसके बाद देवेंद्रनाथ टैगोर, केशव चंद्र सेन, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, ज्योतिबा फुले, सर सैयद अहमद खान और महादेव गोविंद रानाडे जैसे नेताओं ने सुधार की अलख जगाई। इन्होंने शिक्षा, धर्म, जाति व्यवस्था और महिला अधिकारों पर कार्य किया।
रेलवे NTPC परीक्षा में इस अध्याय से संस्थाओं की स्थापना के वर्ष, संस्थापकों के नाम, उनके मुख्य कार्य और सुधारों पर प्रश्न पूछे जाते हैं। इसलिए संस्था-संस्थापक-वर्ष की त्रिपदी को ध्यान से रटना आवश्यक है।
राजा राममोहन रॉय (1772-1833): उन्हें 'भारतीय पुनर्जागरण के जनक', 'आधुनिक भारत के जनक' और 'प्रथम आधुनिक भारतीय' कहा जाता है। वे बंगाल के राधानगर में जन्मे। उन्होंने विभिन्न धर्मों का गहन अध्ययन किया – संस्कृत, अरबी, फारसी, अंग्रेजी और यूनानी भाषाओं के ज्ञाता थे।
ब्रह्म समाज का विकास: 1. देवेंद्रनाथ टैगोर (1817-1905): राजा राममोहन रॉय के बाद ब्रह्म समाज के नेता बने। उन्होंने 1839 में तत्त्वबोधिनी सभा बनाई, जिसका उद्देश्य वेदों का अध्ययन एवं ब्रह्म समाज का प्रचार था। 'ब्रह्म धर्म' नामक ग्रंथ लिखा। 2. केशव चंद्र सेन (1838-1884): देवेंद्रनाथ के बाद के नेता। उन्होंने ब्रह्म समाज को अधिक कट्टरपंथी बनाया। 1866 में कट्टरपंथी विचारों के कारण उन्होंने अलग 'ब्रह्म समाज ऑफ इंडिया' बनाया, जबकि देवेंद्रनाथ का समूह 'आदि ब्रह्म समाज' कहलाया। 3. 1878 में विभाजन: केशव चंद्र सेन के विवादास्पद निर्णयों (अपनी बेटी का कूपर विवाह) के कारण उनके अनुयायियों ने साधारण ब्रह्म समाज बनाया।
अन्य बंगाली सुधारक: 1. हेनरी विवियन डेरोज़ियो (1809-1831): यंग बंगाल आंदोलन के प्रणेता, हिंदू कॉलेज (कलकत्ता) के शिक्षक, जिन्होंने युवाओं में बौद्धिक क्रांति की। उन्हें 'यंग बंगाल का अग्रदूत' कहा गया। 2. ईश्वर चंद्र विद्यासागर (1820-1891): विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (1856) पारित कराने में सहायक। 'विद्यासागर' की उपाधि उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में कार्यों के लिए मिली। बाल विवाह का विरोध, स्त्री शिक्षा और कटक में बंगाली पुस्तकों के लेखक। 3. द्वारकानाथ गांगुली, आनंद मोहन बोस, सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे व्यक्ति भी सुधार में सक्रिय रहे।
स्वामी दयानंद सरस्वती (1824-1883) और आर्य समाज: गुजरात के मूलवासी दयानंद सरस्वती (मूल नाम मूल शंकर तिवारी) ने 7 अप्रैल, 1875 को मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस (1836-1886): बंगाल के धार्मिक संत, जिन्होंने सिखाया कि 'सभी धर्म अलग-अलग मार्ग हैं, पर मंजिल एक है'। उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद (नरेंद्रनाथ दत्त) थे।
स्वामी विवेकानंद (1863-1902): - 1893 में शिकागो की विश्व धर्म संसद में उनका प्रसिद्ध भाषण दिया, जिसने उन्हें विश्वविख्यात बना दिया। - 1897 में कलकत्ता में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इसका उद्देश्य मानव सेवा को ईश्वर सेवा मानना था। - उनका मंत्र था – 'आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च'। उन्होंने युवाओं को आध्यात्मिक एवं शारीरिक शक्ति के साथ सामाजिक सेवा के लिए प्रेरित किया।
प्रार्थना समाज (1867): महाराष्ट्र में अत्माराम पांडुरंग, महादेव गोविंद रानाडे, आर.जी. भंडारकर, एन.जी. चंदावरकर और रानाडे की सहयोगी पत्नी रमाबाई के प्रयास से बनी। यह ब्रह्म समाज का प्रभावित महाराष्ट्र का समाज था।
महादेव गोविंद रानाडे: 'महाराष्ट्र के सुधारक' और 'दक्कन एजुकेशन सोसाइटी' के संस्थापक। विधवा पुनर्विवाह और स्त्री शिक्षा के समर्थक। 'प्रार्थना समाज' के सक्रिय सदस्य।
ज्योतिबा फुले (1827-1890): महाराष्ट्र के महान समाज सुधारक। 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की। उनकी पुस्तक 'गुलामगिरी' में निम्न जातियों के शोषण का विरोध किया गया। उन्होंने पहला बालिका विद्यालय पूना में खोला (सावित्रीबाई फुले के साथ)।
श्री नारायण गुरु (1856-1928): केरल के सुधारक। 'एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर' का नारा। श्रीनारायण धर्म परिपालन योगम (SNDP) संस्था बनाई। जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष किया।
पंडित रामबाई, रमाबाई रानाडे, एनी बेसेंट, पंडिता रमाबाई (दक्षिण भारत, 'शारदा सदन') महिला सुधारकों में प्रमुख थीं। डॉ. अत्रेय, डॉ. आनंदीबाई जोशी प्रथम महिला चिकित्सक (1886 में अमेरिका से डिग्री) थीं।
सर सैयद अहमद खान (1817-1898): उत्तर प्रदेश के दिल्ली क्षेत्र से जुड़े, मुस्लिम सुधार आंदोलन के महान नेता। उन्होंने मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा की ओर प्रेरित किया।
वहाबी आंदोलन: शाह वलीउल्लाह (1703-1762) के विचारों से प्रेरित; सैयद अहमद बरेलवी (1786-1831) ने 1821 के आसपास इसे आगे बढ़ाया। इसे 'तारिक-ए-मुहम्मदिया' भी कहा जाता है। सिखों और अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष।
देवबंद आंदोलन: 1867 में मुहम्मद कासिम नानौतवी और रशीद अहमद गंगोही ने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के देवबंद में दारुल उलूम देवबंद की स्थापना की। इसका उद्देश्य धार्मिक शिक्षा और सामाजिक सुधार था।
अलीगढ़ आंदोलन बनाम वहाबी: सर सैयद ने अंग्रेजों से सहयोग की नीति अपनाई, जबकि वहाबी अंग्रेज विरोधी थे।
सिख सुधार: निरंकारी आंदोलन (राम सिंह/बाबा दयाल) और नामधारी आंदोलन (बाबा राम सिंह) प्रमुख थे। नामधारियों ने 'मांस और शराब' का विरोध किया।
पारसी सुधार: नौरोजी फरदूनजी, दादाभाई नौरोजी ('भारत के बुजुर्ग' तथा 'भारत के महान पारसी'), रेहमतुल्ला एम. सयानी जैसे पारसी समाज सुधारक थे। पारसी सभाओं (रहनुमाई मजदयासन सभा, 1851) ने भी सुधार किए।
इस्लाम में तर्कवाद: अहमद खान का तर्कवाद, चिराग अली का कट्टरपंथ, और अली बंधुओं का संघर्ष आदि शामिल हैं।
| संस्था | वर्ष | संस्थापक |
|---|---|---|
| आत्मीय सभा | 1815 | राजा राममोहन रॉय |
| ब्रह्म समाज | 1828 | राजा राममोहन रॉय |
| तत्त्वबोधिनी सभा | 1839 | देवेंद्रनाथ टैगोर |
| प्रार्थना समाज | 1867 | अत्माराम पांडुरंग, रानाडे |
| आर्य समाज | 1875 | स्वामी दयानंद सरस्वती |
| सत्यशोधक समाज | 1873 | ज्योतिबा फुले |
| रामकृष्ण मिशन | 1897 | स्वामी विवेकानंद |
| महिला सभाएँ | 1897 | रमाबाई रानाडे |
| घटना | वर्ष | विवरण |
|---|---|---|
| सती प्रथा उन्मूलन | 1829 | विनियम XVII, विलियम बेंटिंक |
| विधवा पुनर्विवाह अधिनियम | 1856 | ईश्वर चंद्र विद्यासागर का समर्थन |
| शिकागो धर्म संसद | 1893 | विवेकानंद का भाषण |
| मुहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज | 1875 | सर सैयद अहमद खान |
| 'गुलामगिरी' पुस्तक | 1873 | ज्योतिबा फुले |
flowchart TD
A[सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन] --> B[राजा राममोहन रॉय]
A --> C[दयानंद सरस्वती]
A --> D[विवेकानंद]
A --> E[ज्योतिबा फुले]
A --> F[सर सैयद अहमद खान]
B --> B1[ब्रह्म समाज 1828]
B --> B2[सती प्रथा उन्मूलन 1829]
B1 --> B3[देवेंद्रनाथ तत्त्वबोधिनी 1839]
C --> C1[आर्य समाज 1875 मुंबई]
C --> C2[वेदों की ओर लौटो]
C --> C3[शुद्धि आंदोलन]
D --> D1[शिकागो भाषण 1893]
D --> D2[रामकृष्ण मिशन 1897]
E --> E1[सत्यशोधक समाज 1873]
F --> F1[MAO कॉलेज 1875]
F1 --> F2[अलीगढ़ विश्वविद्यालय 1920]
सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलनों ने उन्नीसवीं शताब्दी के भारत को परंपरा के जड़त्व से निकालकर आधुनिकता की ओर अग्रसर किया। राजा राममोहन रॉय से लेकर स्वामी विवेकानंद तक इन आंदोलनों ने सती प्रथा, बाल विवाह, जाति भेदभाव और धार्मिक अंधविश्वासों के विरुद्ध संघर्ष किया तथा शिक्षा, महिला अधिकार और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया। ये आंदोलन न केवल सामाजिक सुधार थे, बल्कि इन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद की सांस्कृतिक नींव भी तैयार की। इनकी सटीक जानकारी के बिना आधुनिक भारत के विकास को समझना संभव नहीं है।