विषय: रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 अध्याय: जीव विज्ञान – नियंत्रण जनन और आनुवंशिकता विषय-वस्तु: 18.5 लैंगिक जनन
लैंगिक जनन (sexual reproduction) वह जनन विधि है जिसमें नए जीव के निर्माण में दो जनक — नर और मादा — भाग लेते हैं। इस प्रक्रिया में नर तथा मादा युग्मकों (गैमीट्स) का संलयन (निषेचन) होता है। युग्मकों का संलयन अर्धसूत्री विभाजन (meiosis) के बाद होता है, जिसके परिणामस्वरूप संतति में आनुवंशिक विविधता उत्पन्न होती है। रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 परीक्षा में लैंगिक जनन की प्रक्रिया, युग्मक निर्माण, पुष्प के भाग तथा निषेचन से संबंधित प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं। लैंगिक जनन अलैंगिक जनन से इस मायने में भिन्न है कि इसमें संतति जनक के समान नहीं होती, बल्कि दोनों जनकों की विशेषताओं का संयोजन होती है।
लैंगिक जनन की प्रमुख विशेषताएँ हैं — इसमें दो जनक भाग लेते हैं, युग्मक निर्माण होता है, निषेचन होता है, विभाजन अर्धसूत्री होता है तथा संतति में आनुवंशिक विविधता होती है। यह विविधता ही प्रजाति को बदलते पर्यावरण में जीवित रहने में सहायक होती है। लैंगिक जनन उच्च पादपों तथा उच्च जंतुओं — मनुष्य, स्तनधारी, पक्षी — में पाया जाता है। पादपों में लैंगिक जनन का मुख्य अंग पुष्प है, जबकि जंतुओं में जनन अंग युग्मक बनाते हैं।
इस अध्याय में हम युग्मक निर्माण, पुष्प की संरचना तथा उसके भाग, परागण के प्रकार, निषेचन की प्रक्रिया तथा लैंगिक जनन का महत्व विस्तार से अध्ययन करेंगे। साथ ही अर्धसूत्री विभाजन की भूमिका और लैंगिक जनन के लाभ तथा हानियों को समझेंगे। परीक्षा की दृष्टि से पुष्प के नर एवं मादा भाग, परागण तथा निषेचन के चरण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन तथ्यों की स्पष्ट समझ से रेलवे परीक्षा में निश्चित अंक प्राप्त किए जा सकते हैं।
युग्मक (Gametes): नर एवं मादा जनन कोशिकाएँ युग्मक कहलाती हैं। नर युग्मक को शुक्राणु (sperm) तथा मादा युग्मक को अंडाणु (ovum) कहते हैं। युग्मक अर्धसूत्री विभाजन द्वारा बनते हैं, जिसके कारण इनमें गुणसूत्रों की संख्या जनक कोशिका की अपेक्षा आधी होती है। जंतुओं में युग्मक निर्माण की प्रक्रिया को जनन कोशिका निर्माण (gametogenesis) कहते हैं। नर युग्मक निर्माण को शुक्राणुजनन (spermatogenesis) तथा मादा युग्मक निर्माण को अंडजनन (oogenesis) कहते हैं। युग्मकों में निषेचन के समय यदि गुणसूत्र संख्या आधी न होती, तो पीढ़ी दर पीढ़ी गुणसूत्र संख्या दोगुनी होती जाती। अतः अर्धसूत्री विभाजन लैंगिक जनन का अनिवार्य अंग है।
निषेचन (Fertilization): नर तथा मादा युग्मकों के संलयन की प्रक्रिया निषेचन कहलाती है। निषेचन से युग्मज (zygote) बनता है, जिसमें गुणसूत्रों की पूर्ण संख्या (द्विगुणित) होती है। युग्मज माइटोसिस द्वारा विभाजित होकर नया जीव बनाता है। निषेचन के आधार पर इसे दो प्रकारों में बाँटा जाता है — बाह्य निषेचन और आंतरिक निषेचन। बाह्य निषेचन शरीर के बाहर होता है, जैसे मछलियों और मेंढकों में। आंतरिक निषेचन शरीर के भीतर होता है, जैसे मनुष्य तथा स्तनधारियों में। बाह्य निषेचन में अधिक संख्या में युग्मक बनते हैं, जबकि आंतरिक निषेचन में संतति को अधिक सुरक्षा मिलती है।
लैंगिक जनन में आनुवंशिक विविधता: लैंगिक जनन में संतति को दोनों जनकों से गुणसूत्र प्राप्त होते हैं। अर्धसूत्री विभाजन में क्रॉसिंग ओवर (विनिमय) तथा युग्मकों के संयोजन से संतति में आनुवंशिक विविधता उत्पन्न होती है। यह विविधता ही विकास की प्रक्रिया का आधार है। रेलवे परीक्षा में प्रायः पूछा जाता है कि लैंगिक जनन में आनुवंशिक विविधता क्यों उत्पन्न होती है।
पुष्प (flower) पादप का जनन अंग है। पुष्प विभिन्न भागों से मिलकर बना होता है — बाह्यदल पुंज (calyx), दल पुंज (corolla), पुमंग (androecium) तथा जायांग (gynoecium)। बाह्यदल हरे रंग के होते हैं और कली की रक्षा करते हैं। दल पुंज रंगीन होते हैं तथा परागण के लिए कीटों को आकर्षित करते हैं। पुमंग पुष्प का नर भाग है, जिसमें पुंकेसर (stamen) होते हैं। प्रत्येक पुंकेसर दो भागों से बना होता है — पुतंतु (filament) तथा परागकोश (anther)। परागकोश में परागकण (pollen grains) बनते हैं। जायांग पुष्प का मादा भाग है, जिसमें अंडप (carpel) होते हैं। प्रत्येक अंडप तीन भागों से बना होता है — वर्तिकाग्र (stigma), वर्तिका (style) तथा अंडाशय (ovary)। अंडाशय में बीजांड (ovules) होते हैं, जिनमें मादा युग्मक (अंड कोशिका) पाई जाती है।
वर्तिकाग्र परागकणों को ग्रहण करने वाला सतह है, वर्तिका वर्तिकाग्र और अंडाशय को जोड़ने वाली नली है, तथा अंडाशय में बीजांड स्थित होते हैं। निषेचन के बाद बीजांड बीज बनते हैं और अंडाशय फल बनता है। परीक्षा में प्रायः पूछा जाता है कि पुष्प का नर भाग पुंकेसर तथा मादा भाग अंडप होता है।
परागण (Pollination): परागकणों का वर्तिकाग्र तक स्थानांतरण परागण कहलाता है। यदि परागकण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर गिरते हैं तो इसे स्वपरागण (self-pollination) कहते हैं। यदि परागकण किसी अन्य पादप के पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं तो इसे परपरागण (cross-pollination) कहते हैं। परपरागण के माध्यम हैं — कीट, पक्षी, वायु, जल। परपरागण से अधिक आनुवंशिक विविधता होती है। परागण के बाद निषेचन होता है।
निषेचन की प्रक्रिया: परागकण वर्तिकाग्र पर अंकुरित होकर पराग नलिका बनाता है। यह नलिका वर्तिका से होकर अंडाशय में बीजांड तक पहुँचती है। नर युग्मक पराग नलिका के माध्यम से बीजांड में पहुँचकर अंड कोशिका से संलयित होता है। इस संलयन को निषेचन कहते हैं। इससे युग्मज बनता है। निषेचन के बाद बीजांड बीज बनता है तथा अंडाशय फल में बदलता है। द्वि-निषेचन (double fertilization) आवृतबीजी पादपों की विशेषता है, जिसमें एक युग्मक अंड से तथा दूसरा ध्रुवीय केंद्रकों से संलयित होता है।
लैंगिक जनन का मुख्य महत्व आनुवंशिक विविधता है। यह विविधता प्रजाति को रोगों तथा पर्यावरणीय परिवर्तनों के विरुद्ध प्रतिरोध प्रदान करती है। अलैंगिक जनन में सभी संततियाँ समरूप होती हैं, जिससे किसी रोग के लगने पर पूरी आबादी नष्ट हो सकती है, जबकि लैंगिक जनन में विविधता होने से कुछ जीव रोग से बच जाते हैं।
अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis): यह विभाजन केवल जनन कोशिकाओं में होता है। इसमें गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है, इसलिए इसे अपचयन विभाजन (reduction division) भी कहते हैं। अर्धसूत्री विभाजन में दो क्रमिक विभाजन होते हैं — अर्धसूत्री विभाजन प्रथम तथा द्वितीय। अर्धसूत्री विभाजन प्रथम में क्रॉसिंग ओवर होता है, जिसमें जनकों से प्राप्त समजात गुणसूत्रों के खंडों का आदान-प्रदान होता है। इसी क्रॉसिंग ओवर से आनुवंशिक विविधता बढ़ती है। एक जनक कोशिका से चार अगुणित जनन कोशिकाएँ बनती हैं।
लैंगिक जनन के लाभ: आनुवंशिक विविधता, रोग प्रतिरोध क्षमता, पर्यावरण अनुकूलन तथा विकास की संभावना। लैंगिक जनन की हानियाँ — धीमी प्रक्रिया, अधिक ऊर्जा की आवश्यकता, संतति कम संख्या में बनती है। रेलवे परीक्षा में लैंगिक जनन के लाभ तथा अर्धसूत्री विभाजन की भूमिका के प्रश्न प्रायः पूछे जाते हैं।
| भाग | प्रकार | संरचना | कार्य |
|---|---|---|---|
| बाह्यदल पुंज | सहायक | बाह्यदल | कली की रक्षा |
| दल पुंज | सहायक | दल | कीट आकर्षण |
| पुमंग | नर | पुंकेसर (परागकोश) | परागकण निर्माण |
| जायांग | मादा | अंडप (वर्तिकाग्र, वर्तिका, अंडाशय) | अंडाणु तथा बीजांड |
| आधार | अलैंगिक जनन | लैंगिक जनन |
|---|---|---|
| जनक | एक | दो (नर व मादा) |
| युग्मक | नहीं बनते | बनते हैं |
| विभाजन | माइटोसिस | अर्धसूत्री विभाजन |
| विविधता | नहीं | आनुवंशिक विविधता |
| उदाहरण | अमीबा, हाइड्रा | मनुष्य, पुष्पी पादप |
flowchart TD
A[लैंगिक जनन] --> B[दो जनक]
A --> C[युग्मक निर्माण]
A --> D[पुष्प की संरचना]
A --> E[परागण]
A --> F[निषेचन]
B --> B1[नर - शुक्राणु]
B --> B2[मादा - अंडाणु]
C --> C1[अर्धसूत्री विभाजन]
C --> C2[गुणसूत्र आधे]
D --> D1[नर भाग - पुंकेसर]
D --> D2[मादा भाग - अंडप]
E --> E1[स्वपरागण]
E --> E2[परपरागण]
F --> F1[युग्मज]
F --> F2[बीजांड → बीज]
F --> F3[अंडाशय → फल]
A --> G[आनुवंशिक विविधता]
A --> H[विकास का आधार]
लैंगिक जनन जीवों के जनन की उच्चतम एवं महत्वपूर्ण विधि है। इस अध्याय में हमने युग्मक निर्माण, निषेचन तथा आनुवंशिक विविधता के उत्पन्न होने की प्रक्रिया को समझा। पुष्प पादपों का जनन अंग है, जिसमें पुंकेसर नर भाग और अंडप मादा भाग होता है। परागण के बाद पराग नलिका द्वारा निषेचन होता है, जिससे युग्मज बनता है और बीजांड से बीज तथा अंडाशय से फल विकसित होता है। अर्धसूत्री विभाजन गुणसूत्र संख्या आधी करके तथा निषेचन पुनः द्विगुणित करके प्रजाति की गुणसूत्र संख्या स्थिर रखते हैं। लैंगिक जनन से उत्पन्न आनुवंशिक विविधता विकास की प्रक्रिया का आधार है। रेलवे टेक्नीशियन परीक्षा में पुष्प संरचना, परागण तथा निषेचन के प्रश्न सदैव पूछे जाते हैं, अतः इनका अभ्यास निरंतर करना चाहिए।