विषय: रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 अध्याय: जीव विज्ञान – विकास और पर्यावरण विषय-वस्तु: 19.1 विकासवाद
विकासवाद जीव विज्ञान की वह मूलभूत अवधारणा है जो बताती है कि पृथ्वी पर उपस्थित सभी जीवों की उत्पत्ति एक ही पूर्वज से क्रमबद्ध परिवर्तनों के माध्यम से हुई है। रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 परीक्षा में विकासवाद से संबंधित प्रश्न अक्सर डार्विन के सिद्धांत, लैमार्क के अर्जित लक्षणों के सिद्धांत, मानव विकास और विकास के साक्ष्य पर आधारित होते हैं। विकास का शाब्दिक अर्थ है क्रमिक परिवर्तन। समय के साथ जीवों में होने वाले इन संरचनात्मक, शारीरिक तथा व्यवहारिक परिवर्तनों को ही विकास (Evolution) कहा जाता है। यह परिवर्तन लाखों वर्षों की अवधि में धीरे-धीरे घटित होता है।
विकास का अध्ययन परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ से प्रतिवर्ष दो से तीन प्रश्न पूछे जाते हैं। विकासवाद को समझने के लिए जीन, उत्परिवर्तन (Mutation) और यौन जनन के महत्व को जानना आवश्यक है। उत्परिवर्तन जीन या गुणसूत्रों में होने वाले अचानक परिवर्तन हैं, जो नई विशेषताओं को जन्म देते हैं। यौन जनन में माता-पिता दोनों के जीन मिलकर संतति में नए संयोजन बनाते हैं। इन्हीं नए संयोजनों के कारण जीवों में विभिन्नता उत्पन्न होती है, और यही विभिन्नता विकास की कच्ची सामग्री (Raw Material) है।
इस अध्याय में हम विकासवाद की अवधारणा, डार्विन का प्राकृतिक चयन, लैमार्कवाद, विकास के प्रमाण तथा मानव विकास की क्रमिक अवस्थाओं का अध्ययन करेंगे। यह अध्याय 19.2 प्राकृतिक चयन और 19.3 जीवाश्म एवं अनुकूलन की नींव है, इसलिए इसे ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिए। विकासवाद को समझने से यह स्पष्ट होता है कि जैव विविधता किस प्रकार उत्पन्न हुई और जीव पर्यावरण के अनुसार स्वयं को किस प्रकार ढालते हैं।
विकास की व्याख्या के लिए समय-समय पर अनेक वैज्ञानिकों ने अपने-अपने सिद्धांत प्रस्तुत किए। इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण लैमार्कवाद और डार्विनवाद हैं।
लैमार्कवाद (Lamarckism): फ्रांसीसी वैज्ञानिक जीन बैप्टिस्ट लैमार्क ने सन् 1809 में अपनी पुस्तक फिलोसोफी जूलॉजिक में यह सिद्धांत प्रस्तुत किया। लैमार्क के सिद्धांत के मुख्य बिंदु हैं: (क) जीवों के अंगों का उपयोग और अनुपयोग, (ख) अर्जित लक्षणों की वंशागति, (ग) प्राकृतिक आवश्यकताएँ नए अंगों का विकास कराती हैं। लैमार्क के अनुसार जिराफ़ की लंबी गर्दन उसके द्वारा ऊँचे वृक्षों की पत्तियाँ खाने के लिए लगातार गर्दन तानने के कारण विकसित हुई और यह अर्जित लक्षण अगली पीढ़ी में स्थानांतरित हुआ। इसी प्रकार जलपक्षियों के पैरों के बीच की झिल्ली लगातार जल को चीरने के कारण विकसित हुई।
डार्विनवाद (Darwinism): अंग्रेज़ वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने सन् 1859 में अपनी पुस्तक 'ऑरिजिन ऑफ स्पीशीज़' में विकास का प्राकृतिक चयन सिद्धांत प्रस्तुत किया। डार्विनवाद के प्रमुख बिंदु हैं: (क) अति-जनन, (ख) सीमित खाद्य एवं संसाधन, (ग) अस्तित्व के लिए संघर्ष, (घ) योग्यतम की उत्तरजीविता, (ङ) प्राकृतिक चयन, (च) लक्षणों की वंशागति। डार्विन के अनुसार प्रकृति उन जीवों का चयन करती है जो अपने पर्यावरण के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होते हैं और वही जीव जीवित रहकर अपने लक्षण अगली पीढ़ी में स्थानांतरित करते हैं।
उत्परिवर्तनवाद (Mutationism): डच वैज्ञानिक ह्यूगो डी व्रीज़ ने बताया कि जीन में होने वाले अचानक परिवर्तन ही विकास का कारण हैं। इन्हीं उत्परिवर्तनों के कारण जीवों में नई जातियाँ बनती हैं। आधुनिक विकासवाद डार्विनवाद और उत्परिवर्तनवाद का संयोजन है, जिसे सिंथेटिक थ्योरी या नव-डार्विनवाद कहते हैं।
विकास के होने का समर्थन अनेक प्रकार के प्रमाणों से होता है। इनमें से कुछ निम्नलिखित हैं।
जीवाश्म (Fossils): जीवाश्म प्राचीन जीवों के अवशेष या चिह्न हैं जो चट्टानों में दबे मिलते हैं। पुरानी चट्टानों में सरल जीवों के जीवाश्म और नई चट्टानों में जटिल जीवों के जीवाश्म मिलते हैं। यह क्रम इस बात का प्रमाण है कि सरल जीवों से जटिल जीवों की ओर विकास हुआ है। उदाहरण के लिए, आर्कियोप्टेरिक्स एक जीवाश्म पक्षी है जिसमें सरीसृप और पक्षी दोनों के लक्षण पाए जाते हैं।
अंगों की समरूपता (Homologous Organs): वे अंग जिनकी संरचना एवं उत्पत्ति समान होती है परंतु कार्य भिन्न होते हैं, समजात अंग कहलाते हैं। उदाहरण के लिए, मेंढक का अग्रपाद, चमगादड़ का पंख, व्हेल का फ्लिपर और मनुष्य का हाथ सभी की उत्पत्ति एक ही आधारभूत संरचना से हुई है। समजात अंग यह सिद्ध करते हैं कि सभी कशेरुकी जीवों के पूर्वज एक हैं।
अंगों की समानता (Analogous Organs): वे अंग जिनकी संरचना एवं उत्पत्ति भिन्न होती है परंतु कार्य समान होता है, समानांग अंग कहलाते हैं। उदाहरण के लिए, कीट के पंख और पक्षी के पंख दोनों उड़ने के लिए हैं परंतु इनकी संरचना भिन्न है। समानांग अंग यह बताते हैं कि अलग-अलग जीव समान पर्यावरणीय दबाव के कारण समान कार्य के लिए समान अंग विकसित करते हैं।
भ्रूणविज्ञानी प्रमाण (Embryological Evidence): सभी कशेरुकी जीवों के भ्रूण के प्रारंभिक विकास में समानता पाई जाती है। हक़ेल के बायोजेनेटिक नियम के अनुसार जीवन का भ्रूणीय विकास जाति के विकास की पुनरावृत्ति करता है। इस प्रकार भ्रूण का विकास भी विकास का एक महत्वपूर्ण प्रमाण है।
मानव का विकास वानरों जैसे पूर्वजों से हुआ माना जाता है। इसी वंश के सदस्य जैसे रामापिथेकस, ऑस्ट्रेलोपिथेकस, होमो हैबिलिस, होमो इरेक्टस और होमो सेपियन्स मानव विकास की क्रमिक अवस्थाएँ हैं। रामापिथेकस मानव का प्रथम प्रत्यक्ष पूर्वज है जो लगभग 14 लाख वर्ष पूर्व पाया जाता था। ऑस्ट्रेलोपिथेकस द्विपाद था और उसका मस्तिष्क आधुनिक मानव से छोटा था। होमो हैबिलिस को टूल मेकर कहा जाता है। होमो इरेक्टस अग्नि का प्रयोग करता था। होमो सेपियन्स अर्थात आधुनिक मानव जो सोचने-समझने की क्षमता रखता है, विकास की अंतिम अवस्था है।
मानव विकास की समझ के लिए यह जानना आवश्यक है कि मानव और वानर (चिंपैंज़ी) के पूर्वज समान थे। आनुवंशिक अध्ययन बताते हैं कि मानव और चिंपैंज़ी के DNA में लगभग 98.8 प्रतिशत समानता है। यह समानता विकासवाद को प्रबल समर्थन देती है। मानव विकास में मस्तिष्क के आकार में क्रमिक वृद्धि, द्विपादीय गति (दो पैरों पर चलना), वाणी का विकास और औजारों के निर्माण की क्षमता प्रमुख परिवर्तन हैं।
| वैज्ञानिक | वर्ष | सिद्धांत | मुख्य बिंदु |
|---|---|---|---|
| लैमार्क | 1809 | लैमार्कवाद | अर्जित लक्षणों की वंशागति, अंगों का उपयोग-अनुपयोग |
| डार्विन | 1859 | प्राकृतिक चयन | अतिजनन, संघर्ष, योग्यतम की उत्तरजीविता |
| डी व्रीज़ | 1901 | उत्परिवर्तनवाद | जीन में अचानक परिवर्तन से विकास |
| हक़ेल | 1866 | बायोजेनेटिक नियम | भ्रूणीय विकास जाति के विकास की पुनरावृत्ति है |
| आधार | समजात अंग (Homologous) | समानांग अंग (Analogous) |
|---|---|---|
| उत्पत्ति | समान | भिन्न |
| संरचना | समान | भिन्न |
| कार्य | भिन्न | समान |
| उदाहरण | मानव हाथ, चमगादड़ का पंख, व्हेल का फ्लिपर | पक्षी का पंख, कीट का पंख |
| महत्व | सामान्य पूर्वज की ओर संकेत | अभिसारी विकास का प्रमाण |
flowchart TD
A[विकासवाद] --> B[सिद्धांत]
A --> C[प्रमाण]
A --> D[मानव विकास]
B --> B1[लैमार्कवाद - अर्जित लक्षण]
B --> B2[डार्विनवाद - प्राकृतिक चयन]
B --> B3[उत्परिवर्तनवाद - डी व्रीज़]
C --> C1[जीवाश्म]
C --> C2[समजात अंग]
C --> C3[समानांग अंग]
C --> C4[भ्रूणविज्ञानी प्रमाण]
D --> D1[रामापिथेकस]
D --> D2[ऑस्ट्रेलोपिथेकस]
D --> D3[होमो हैबिलिस]
D --> D4[होमो इरेक्टस]
D --> D5[होमो सेपियन्स]
विकासवाद जीव विज्ञान की वह केंद्रीय अवधारणा है जो पृथ्वी पर जीवन की विविधता की व्याख्या करती है। इस अध्याय में हमने लैमार्कवाद, डार्विनवाद और उत्परिवर्तनवाद के सिद्धांतों को समझा। हमने सीखा कि जीवाश्म, समजात अंग, समानांग अंग और भ्रूणविज्ञानी साक्ष्य विकास के प्रबल प्रमाण हैं। मानव विकास की क्रमिक अवस्थाएँ रामापिथेकस से लेकर होमो सेपियन्स तक विकास की वैज्ञानिक श्रृंखला को दर्शाती हैं। विकासवाद केवल सैद्धांतिक ज्ञान नहीं है, यह जैव विविधता, संरक्षण और पर्यावरण से संबंधित प्रश्नों को समझने का आधार भी है। अगले अध्याय में हम प्राकृतिक चयन का विस्तार से अध्ययन करेंगे जो डार्विनवाद का सार है।