विषय: रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 अध्याय: जीव विज्ञान – विकास और पर्यावरण विषय-वस्तु: 19.7 प्रदूषण और अपशिष्ट प्रबंधन
प्रदूषण (Pollution) आधुनिक युग की सबसे गंभीर समस्या है जो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित करती है। रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 परीक्षा में प्रदूषण के प्रकार, उनके स्रोत, प्रभाव और अपशिष्ट प्रबंधन से संबंधित प्रश्न प्रतिवर्ष पूछे जाते हैं। पर्यावरण में उन हानिकारक पदार्थों की उपस्थिति जो जीवों और प्राकृतिक संसाधनों को हानि पहुँचाती हैं, प्रदूषण कहलाती है। प्रदूषण उत्पन्न करने वाले पदार्थ को प्रदूषक (Pollutant) कहते हैं। प्रदूषक ठोस, द्रव या गैसीय किसी भी रूप में हो सकते हैं।
प्रदूषण के मुख्य प्रकार हैं: वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और रेडियोधर्मी प्रदूषण। वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में कारखानों का धुआँ, वाहनों की गैसें, औद्योगिक उत्सर्जन और ईंधन का दहन शामिल हैं। जल प्रदूषण में नदियों, झीलों और भूजल में हानिकारक पदार्थों का मिश्रण होता है। मृदा प्रदूषण कीटनाशकों, रासायनिक उर्वरकों और औद्योगिक अपशिष्टों के कारण होता है। ध्वनि प्रदूषण तेज़ आवाज़ के कारण होता है। रेलवे के संदर्भ में, ट्रेनों का इंजन, रेल पटरी पर ट्रेन का घर्षण और हॉर्न ध्वनि प्रदूषण के स्रोत हैं।
अपशिष्ट प्रबंधन (Waste Management) प्रदूषण नियंत्रण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अपशिष्ट को ठोस, द्रव और गैसीय अपशिष्ट के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। ठोस अपशिष्ट को जैविक (कम्पोस्टेबल) और अजैविक (गैर-कम्पोस्टेबल) में बाँटा जाता है। अपशिष्ट प्रबंधन का मुख्य सिद्धांत है: कम करें (Reduce), पुनः उपयोग करें (Reuse) और पुनर्चक्रण करें (Recycle)। इसे 3R सिद्धांत भी कहते हैं। रेलवे में अपशिष्ट प्रबंधन के अंतर्गत स्टेशनों पर सूखा-गीला कचरा अलग करना, ट्रेनों से निकलने वाले कचरे का सही निपटान और औद्योगिक अपशिष्ट का उपचार शामिल है।
प्रदूषण कई प्रकार के होते हैं और इन्हें समझना रेलवे परीक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।
वायु प्रदूषण (Air Pollution): वायुमंडल में हानिकारक गैसों और कणों की अधिक मात्रा को वायु प्रदूषण कहते हैं। प्रमुख वायु प्रदूषक कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और सूक्ष्म कण (PM2.5, PM10) हैं। कार्बन मोनोऑक्साइड अत्यंत विषैली गैस है जो श्वसन तंत्र के लिए हानिकारक है। सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड वायुमंडल में मिलकर अम्लीय वर्षा (Acid Rain) उत्पन्न करते हैं। वायु प्रदूषण से श्वसन रोग, अस्थमा, हृदय रोग और आँखों में जलन होती है।
जल प्रदूषण (Water Pollution): जल स्रोतों में हानिकारक पदार्थों के मिश्रण को जल प्रदूषण कहते हैं। जल प्रदूषण के स्रोत औद्योगिक अपशिष्ट, घरेलू सीवेज, कीटनाशक, रासायनिक उर्वरक और तेल रिसाव हैं। जल प्रदूषण से जलजनित रोग जैसे हैजा, टाइफाइड और पेचिश होते हैं। जल में ऑक्सीजन की कमी होने से जलीय जीव मर जाते हैं। कुछ रासायनिक अपशिष्ट जैसे पारा (Mercury) जल में अत्यंत विषैले होते हैं।
मृदा प्रदूषण (Soil Pollution): मिट्टी में हानिकारक रसायनों और अपशिष्टों के संचय को मृदा प्रदूषण कहते हैं। मृदा प्रदूषण के कारण कीटनाशक, रासायनिक उर्वरक, औद्योगिक अपशिष्ट और प्लास्टिक हैं। मृदा प्रदूषण से मिट्टी की उर्वरता घटती है और फसलों में हानिकारक रसायन संचित होते हैं। डीडीटी जैसे कीटनाशक मिट्टी में लंबे समय तक बने रहते हैं और खाद्य श्रृंखला में जैव आवर्धन करते हैं।
ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution): अत्यधिक और अवांछित ध्वनि को ध्वनि प्रदूषण कहते हैं। इसका मापन डेसीबल (Decibel) में किया जाता है। 85 डेसीबल से अधिक ध्वनि मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मानी जाती है। ध्वनि प्रदूषण के स्रोत वाहन, रेल इंजन, हॉर्न, कारखानों की मशीनें और विमान हैं। ध्वनि प्रदूषण से श्रवण हानि, तनाव, उच्च रक्तचाप और नींद की समस्या होती है। रेलवे ट्रैक के निकट रहने वाले लोग ध्वनि प्रदूषण से प्रभावित होते हैं।
रेडियोधर्मी प्रदूषण (Radioactive Pollution): परमाणु ऊर्जा संयंत्रों, परमाणु परीक्षणों और चिकित्सा केंद्रों से निकलने वाले रेडियोधर्मी पदार्थों के कारण होने वाले प्रदूषण को रेडियोधर्मी प्रदूषण कहते हैं। यह सबसे खतरनाक प्रदूषण है क्योंकि यह आनुवंशिक परिवर्तन और कैंसर उत्पन्न कर सकता है।
वायु प्रदूषण से जुड़ी तीन प्रमुख वैश्विक समस्याएँ हैं जो रेलवे परीक्षा में बार-बार पूछी जाती हैं।
ग्रीन हाउस प्रभाव (Greenhouse Effect): वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और जलवाष्प जैसी गैसें पृथ्वी की ऊष्मा को वायुमंडल में रोकती हैं। इन्हें ग्रीन हाउस गैसें कहते हैं। इस प्रक्रिया को ग्रीन हाउस प्रभाव कहते हैं। यह प्रक्रिया पृथ्वी को गर्म बनाए रखने में सहायक है, परंतु ग्रीन हाउस गैसों की बढ़ती मात्रा के कारण पृथ्वी के तापमान में असामान्य वृद्धि हो रही है, जिसे ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं। ग्लोबल वार्मिंग से हिमनद पिघल रहे हैं और समुद्र स्तर बढ़ रहा है।
ओजोन परत का ह्रास (Ozone Depletion): ओजोन परत (Ozone Layer) समताप मंडल में स्थित होती है और सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों से पृथ्वी की रक्षा करती है। क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) जैसे रसायन ओजोन परत का ह्रास करते हैं। ये रसायन एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर और स्प्रे में प्रयोग होते हैं। ओजोन ह्रास से पराबैंगनी किरणें पृथ्वी तक पहुँचती हैं जिससे त्वचा कैंसर और आँखों की बीमारियाँ बढ़ती हैं।
अम्लीय वर्षा (Acid Rain): कारखानों और वाहनों से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड वायुमंडल में जलवाष्प से मिलकर सल्फ्यूरिक एसिड और नाइट्रिक एसिड बनाती हैं। जब ये एसिड वर्षा के साथ पृथ्वी पर गिरते हैं तो अम्लीय वर्षा होती है। अम्लीय वर्षा इमारतों, स्मारकों, वनस्पतियों और जलीय जीवों को हानि पहुँचाती है। ताज महल की पीली परत अम्लीय वर्षा से संबंधित प्रदूषण का प्रसिद्ध उदाहरण है।
अपशिष्ट प्रबंधन (Waste Management) का उद्देश्य अपशिष्ट के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना है। अपशिष्ट प्रबंधन के मुख्य तरीकों को समझना आवश्यक है।
अपशिष्ट के प्रकार: अपशिष्ट मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं: जैवनिम्नीकरणीय (Biodegradable) अपशिष्ट जैसे खाद्य पदार्थ, सब्जियों के छिलके, कागज़ और जैवनिम्नीकरणीय नहीं (Non-biodegradable) अपशिष्ट जैसे प्लास्टिक, काँच, धातु और पॉलिथीन। जैवनिम्नीकरणीय अपशिष्ट सूक्ष्मजीवों द्वारा विघटित हो जाते हैं जबकि जैवनिम्नीकरणीय नहीं अपशिष्ट विघटित नहीं होते और लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहते हैं। प्लास्टिक को विघटित होने में सैकड़ों वर्ष लगते हैं।
3R सिद्धांत: अपशिष्ट प्रबंधन का मूल सिद्धांत 3R है: Reduce (कम करें), Reuse (पुनः उपयोग करें), Recycle (पुनर्चक्रण करें)। कम करने का अर्थ है कम अपशिष्ट उत्पन्न करना। पुनः उपयोग का अर्थ है वस्तुओं को फिर से उपयोग करना। पुनर्चक्रण का अर्थ है अपशिष्ट से नई वस्तुएँ बनाना, जैसे प्लास्टिक और काँच का पुनर्चक्रण।
अपशिष्ट प्रबंधन के उपाय: कम्पोस्टिंग से जैविक अपशिष्ट को खाद में बदला जाता है। कचरा भस्मीकरण (Incineration) से ज्वलनशील अपशिष्ट को जलाया जाता है। भू-भराव (Landfill) में अपशिष्ट को मिट्टी में दबाया जाता है। जल का उपचार (Sewage Treatment) से गंदे पानी को शुद्ध किया जाता है। रेलवे स्टेशनों पर कचरे को सूखा और गीला करके अलग-अलग किया जाता है ताकि पुनर्चक्रण और कम्पोस्टिंग में सुविधा हो।
प्रदूषण नियंत्रण के उपाय: वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए वृक्षारोपण, प्रदूषण नियंत्रण यंत्र (इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर) और स्वच्छ ईंधन का उपयोग किया जाता है। जल प्रदूषण नियंत्रण के लिए औद्योगिक अपशिष्ट का उपचार और नदियों में सीवेज का सीधा निपटान रोकना आवश्यक है। ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण के लिए हॉर्न का कम उपयोग, ध्वनि अवरोधक (Sound Barrier) और वृक्षारोपण किया जाता है। वायु (जनित प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम 1981, जल (प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम 1974 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 भारत के प्रमुख पर्यावरण अधिनियम हैं।
| प्रदूषण | मुख्य स्रोत | मुख्य प्रभाव |
|---|---|---|
| वायु प्रदूषण | कारखानों का धुआँ, वाहन गैसें | श्वसन रोग, अस्थमा |
| जल प्रदूषण | सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट | हैजा, टाइफाइड |
| मृदा प्रदूषण | कीटनाशक, उर्वरक | उर्वरता में कमी |
| ध्वनि प्रदूषण | हॉर्न, मशीनें | श्रवण हानि, तनाव |
| रेडियोधर्मी प्रदूषण | परमाणु संयंत्र | कैंसर, आनुवंशिक परिवर्तन |
| विषय | विवरण |
|---|---|
| जैवनिम्नीकरणीय अपशिष्ट | खाद्य पदार्थ, सब्जी के छिलके, कागज़ |
| जैवनिम्नीकरणीय नहीं अपशिष्ट | प्लास्टिक, काँच, धातु |
| 3R सिद्धांत | Reduce, Reuse, Recycle |
| कम्पोस्टिंग | जैविक अपशिष्ट को खाद में बदलना |
| भू-भराव (Landfill) | अपशिष्ट को मिट्टी में दबाना |
| ध्वनि मापन इकाई | डेसीबल (Decibel) |
flowchart TD
A[प्रदूषण और अपशिष्ट प्रबंधन] --> B[प्रदूषण के प्रकार]
A --> C[वैश्विक समस्याएँ]
A --> D[अपशिष्ट प्रबंधन]
B --> B1[वायु प्रदूषण]
B --> B2[जल प्रदूषण]
B --> B3[मृदा प्रदूषण]
B --> B4[ध्वनि प्रदूषण]
B --> B5[रेडियोधर्मी प्रदूषण]
C --> C1[ग्रीन हाउस प्रभाव]
C --> C2[ओजोन ह्रास - CFC]
C --> C3[अम्लीय वर्षा]
D --> D1[जैवनिम्नीकरणीय अपशिष्ट]
D --> D2[जैवनिम्नीकरणीय नहीं अपशिष्ट]
D --> D3[3R सिद्धांत]
D --> D4[कम्पोस्टिंग, भस्मीकरण]
प्रदूषण और अपशिष्ट प्रबंधन आधुनिक पर्यावरणीय चुनौतियों के केंद्र में हैं। इस अध्याय में हमने वायु, जल, मृदा, ध्वनि और रेडियोधर्मी प्रदूषण के स्रोत और प्रभावों का अध्ययन किया। हमने ग्रीन हाउस प्रभाव, ओजोन ह्रास और अम्लीय वर्षा जैसी वैश्विक समस्याओं को समझा। अपशिष्ट प्रबंधन के लिए 3R सिद्धांत, कम्पोस्टिंग, भस्मीकरण और भू-भराव जैसी विधियाँ अपनाई जाती हैं। रेलवे टेक्नीशियन के रूप में, स्टेशनों और ट्रेनों पर अपशिष्ट का सही निपटान और प्रदूषण नियंत्रण हमारी जिम्मेदारी का हिस्सा है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियमों की जानकारी परीक्षा के साथ-साथ कार्यस्थल पर भी उपयोगी है। अगले अध्याय में हम जैव विविधता और संरक्षण का अध्ययन करेंगे।