ध्वनि तरंगें Notes

ध्वनि तरंगें

विषय: रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 अध्याय: भौतिकी – ऊष्मा ध्वनि और प्रकाश विषय-वस्तु: 12.4 ध्वनि तरंगें

1. परिचय

ध्वनि ऊर्जा का वह रूप है जो हमारे कानों में श्रवण संवेदना उत्पन्न करती है। ध्वनि किसी कंपनशील पिंड से उत्पन्न होती है और यांत्रिक तरंगों के रूप में माध्यम में संचरित होती है। रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 परीक्षा में ध्वनि से प्रतिवर्ष 2 से 3 प्रश्न पूछे जाते हैं। इनमें ध्वनि की प्रकृति (अनुदैर्घ्य तरंग), ध्वनि की गति, ध्वनि संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता, श्रव्य परिसर, आवृत्ति, तरंगदैर्घ्य और तरंग गति के सूत्र पर प्रश्न आते हैं। इसके अलावा अवश्रव्य और पराश्रव्य तरंगों पर आधारित प्रश्न भी पूछे जाते हैं।

ध्वनि एक अनुदैर्घ्य तरंग है जिसमें माध्यम के कण तरंग की संचरण दिशा के समानांतर कंपन करते हैं। इसमें संपीड़न (compression) और विरलन (rarefaction) के क्रमिक चक्र बनते हैं। संपीड़न में कण पास-पास आ जाते हैं और दाब अधिक होता है, जबकि विरलन में कण दूर हो जाते हैं और दाब कम होता है। ध्वनि तरंगों के संचरण के लिए माध्यम (ठोस, द्रव या गैस) आवश्यक है; निर्वात में ध्वनि संचरित नहीं होती। यही कारण है कि चंद्रमा पर कोई ध्वनि सुनाई नहीं देती, क्योंकि वहाँ वायुमंडल नहीं है।

इस विषय में हम ध्वनि तरंगों के प्रकार, तरंग की विशेषताएँ — आवृत्ति, तरंगदैर्घ्य, आयाम, समय काल और तरंग गति — तथा इनके मध्य संबंध का अध्ययन करेंगे। हम ध्वनि की गति को विभिन्न माध्यमों में, श्रव्य परिसर (20 Hz से 20,000 Hz) तथा मानव कान की संरचना को समझेंगे। इसके अलावा ध्वनि की गति की गणना, प्रतिध्वनि और ध्वनि प्रदूषण से संबंधित संख्यात्मक प्रश्नों का अभ्यास करेंगे। रेलवे परीक्षा में तरंग गति v = fλ का सूत्र सबसे महत्वपूर्ण है।

2. ध्वनि तरंगों के प्रकार और तरंग की विशेषताएँ

ध्वनि तरंगें तीन प्रकार की होती हैं: अनुदैर्घ्य तरंगें, अनुप्रस्थ तरंगें और पृष्ठ तरंगें। ध्वनि तरंगें वायु में अनुदैर्घ्य होती हैं, जबकि प्रकाश अनुप्रस्थ तरंग है। अनुदैर्घ्य तरंग में कण संचरण दिशा के समानांतर कंपन करते हैं और अनुप्रस्थ तरंग में लंबवत। ध्वनि तरंगें अपने आवृत्ति के आधार पर तीन परिसरों में बँटी होती हैं — अवश्रव्य तरंगें (20 Hz से कम), श्रव्य तरंगें (20 Hz से 20,000 Hz तक) और पराश्रव्य तरंगें (20,000 Hz से अधिक)। मानव कान केवल श्रव्य परिसर की ध्वनि ही सुन सकता है।

तरंग की मुख्य विशेषताएँ निम्न हैं। आवृत्ति (f) किसी बिंदु से एक सेकंड में गुजरने वाली पूर्ण तरंगों की संख्या है, जिसे हर्ट्ज़ (Hz) में मापा जाता है। तरंगदैर्घ्य (λ) दो क्रमागत संपीड़नों या विरलनों के बीच की दूरी है, जिसे मीटर में मापा जाता है। आयाम (A) साम्य स्थिति से कण का अधिकतम विस्थापन है। समय काल (T) एक पूर्ण तरंग बनने में लगा समय है, T = 1/f। तरंग की गति (v), आवृत्ति और तरंगदैर्घ्य में संबंध निम्न है:

v = f × λ

तथा समय काल T = 1/f या f = 1/T होता है। ध्वनि की गति वायु में लगभग 343 m/s (20°C पर), जल में लगभग 1500 m/s और लोहे में लगभग 5100 m/s होती है। ध्वनि की गति ठोस में सबसे अधिक, द्रव में मध्यम और गैस में सबसे कम होती है।

उदाहरण 1: किसी ध्वनि तरंग की आवृत्ति 256 Hz है। वायु में इसकी तरंगदैर्घ्य ज्ञात कीजिए। (ध्वनि की गति = 343 m/s)

हल: v = fλ से λ = v/f = 343/256 = 1.34 m। अतः तरंगदैर्घ्य लगभग 1.34 मीटर होगा।

उदाहरण 2: किसी तरंग का समय काल 0.02 सेकंड है। उसकी आवृत्ति ज्ञात कीजिए।

हल: f = 1/T = 1/0.02 = 50 Hz। अतः आवृत्ति 50 हर्ट्ज़ होगी।

3. ध्वनि की गति और उसे प्रभावित करने वाले कारक

ध्वनि की गति माध्यम की प्रकृति, तापमान, दाब और आर्द्रता पर निर्भर करती है। ध्वनि की गति ठोस में सबसे अधिक होती है क्योंकि ठोसों में कण पास-पास होते हैं और प्रत्यास्थता अधिक होती है। तापमान बढ़ने पर वायु में ध्वनि की गति बढ़ जाती है, क्योंकि तापमान के अनुसार गति 0.6 m/s प्रति °C बढ़ती है। दाब का वायु में ध्वनि की गति पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ता। आर्द्रता बढ़ने पर ध्वनि की गति बढ़ जाती है, क्योंकि जलवाष्प का घनत्व वायु से कम होता है।

ध्वनि की गति का माध्यम के गुणों से संबंध इस प्रकार है कि गति प्रत्यास्थता के वर्गमूल के अनुपाती और घनत्व के वर्गमूल के व्युत्क्रमानुपाती होती है। ध्वनि की गति गैसों में न्यूटन-लाप्लास सूत्र v = √(γP/ρ) से ज्ञात की जाती है। प्रकाश की तुलना में ध्वनि बहुत धीमी चलती है, इसीलिए बिजली कड़कने का प्रकाश पहले दिखाई देता है और आवाज बाद में सुनाई देती है। बादलों की दूरी ज्ञात करने के लिए इसी अंतर का उपयोग किया जाता है।

उदाहरण 3: बिजली की चमक के 3 सेकंड बाद गड़गड़ाहट सुनाई देती है। बादल की दूरी ज्ञात कीजिए। (ध्वनि की गति = 343 m/s)

हल: दूरी = गति × समय = 343 × 3 = 1029 m। अतः बादल लगभग 1029 मीटर दूर है।

उदाहरण 4: किसी बेल की आवृत्ति 680 Hz है। इसकी ध्वनि की तरंगदैर्घ्य वायु में ज्ञात कीजिए। (v = 340 m/s)

हल: λ = v/f = 340/680 = 0.5 m। अतः तरंगदैर्घ्य 0.5 मीटर होगा।

4. श्रव्यता, प्रतिध्वनि और मानव कान

मानव कान की श्रव्यता परिसर 20 Hz से 20,000 Hz तक होती है। 20 Hz से कम आवृत्ति की तरंगें अवश्रव्य तरंगें कहलाती हैं, जैसे भूकंपीय तरंगें और हाथी की आवाज़। 20,000 Hz से अधिक आवृत्ति की तरंगें पराश्रव्य तरंगें हैं, जिन्हें चमगादड़, डॉल्फिन उत्पन्न करती हैं। पराश्रव्य तरंगों का उपयोग सोनार (जल में वस्तुओं की दूरी मापना), अल्ट्रासाउंड (चिकित्सा), सफाई और दोष का पता लगाने में होता है। मानव कान की श्रवण सीमा के अनुसार आवृत्ति जितनी अधिक होती है, ध्वनि उतनी तीक्ष्ण (पतली) सुनाई देती है।

जब ध्वनि किसी बाधा से टकराकर वापस लौटती है, तो उसे ध्वनि का परावर्तन कहते हैं। वापस आने वाली ध्वनि जब स्पष्ट रूप से सुनाई देती है, तो उसे प्रतिध्वनि (echo) कहते हैं। प्रतिध्वनि सुनने के लिए श्रोता और परावर्तक सतह के बीच न्यूनतम दूरी 17.2 मीटर होनी चाहिए, क्योंकि 0.1 सेकंड के भीतर आने वाली ध्वनि मूल ध्वनि के साथ मिल जाती है। ध्वनि का संश्रय (reverberation) तब होता है जब बार-बार परावर्तन से ध्वनि अनेक बार सुनाई देती है, जैसे खाली कमरे में। सभा भवनों और थिएटरों में ध्वनि को अवशोषित करने के लिए झालरदार पर्दे, मुलायम कुशन और ध्वनि अवशोषक पदार्थ लगाए जाते हैं।

मानव कान तीन मुख्य भागों — बाह्य कान, मध्य कान और आंतरिक कान — से बना होता है। बाह्य कान में पिन्ना और कर्ण नाल होती है, मध्य कान में कर्ण पटह (eardrum) और तीन अस्थियाँ (हथौड़ा, निहाई, रकाब) होती हैं, तथा आंतरिक कान में कॉक्लिया होता है जो ध्वनि को विद्युत संकेत में बदलकर मस्तिष्क तक भेजता है। ध्वनि की तीव्रता मापने की इकाई डेसीबल (dB) है। 85 dB से अधिक की ध्वनि लगातार सुनने से कानों को क्षति पहुँच सकती है।

उदाहरण 5: प्रतिध्वनि सुनने के लिए परावर्तक सतह की न्यूनतम दूरी ज्ञात कीजिए। (ध्वनि की गति = 344 m/s, न्यूनतम समय अंतराल 0.1 s)

हल: ध्वनि दूरी 2d तय करती है। 2d = v × t = 344 × 0.1 = 34.4 m, अतः d = 34.4/2 = 17.2 m। अतः न्यूनतम दूरी 17.2 मीटर है।

5. त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: विभिन्न माध्यमों में ध्वनि की गति

माध्यम ध्वनि की गति (m/s)
वायु (0°C) 331
वायु (20°C) 343
जल लगभग 1500
लोहा लगभग 5100

तालिका 2: तरंग की मूल राशियाँ

राशि परिभाषा इकाई
आवृत्ति (f) प्रति सेकंड पूर्ण तरंगों की संख्या हर्ट्ज़ (Hz)
तरंगदैर्घ्य (λ) दो क्रमागत संपीड़नों के बीच दूरी मीटर (m)
आयाम (A) साम्य स्थिति से अधिकतम विस्थापन मीटर (m)
समय काल (T) एक पूर्ण तरंग का समय सेकंड (s)
तरंग गति (v) v = f × λ m/s

6. माइंड मैप

flowchart TD
    A[ध्वनि तरंगें] --> B[अनुदैर्घ्य तरंग]
    A --> C[तरंग की विशेषताएँ]
    A --> D[ध्वनि की गति]
    A --> E[श्रव्य परिसर]
    A --> F[प्रतिध्वनि]
    B --> B1[संपीड़न और विरलन]
    B --> B2[माध्यम आवश्यक, निर्वात में नहीं]
    C --> C1[v = f × λ]
    C --> C2[T = 1/f]
    D --> D1[वायु 343 m/s, जल 1500, लोहा 5100]
    D --> D2[ठोस में सबसे अधिक]
    E --> E1[20 Hz से 20,000 Hz]
    E --> E2[अवश्रव्य < 20 Hz]
    E --> E3[पराश्रव्य > 20,000 Hz]
    F --> F1[न्यूनतम दूरी 17.2 m]

7. महत्वपूर्ण चित्र (SVG)

ध्वनि की अनुदैर्घ्य तरंग (संपीड़न और विरलन) तरंग की संचरण दिशा संपीड़न और विरलन का प्रत्यावर्ती क्रम संपीड़न (उच्च दाब) विरलन (निम्न दाब) संपीड़न विरलन तरंगदैर्घ्य λ = दो क्रमागत संपीड़नों के बीच की दूरी स्वर्ण नियम ध्वनि अनुदैर्घ्य तरंग है और निर्वात में संचरित नहीं होती।

श्रव्य परिसर और ध्वनि की गति अवश्रव्य तरंगें (20 Hz से कम) श्रव्य तरंगें (20 Hz से 20,000 Hz) - मानव कान पराश्रव्य तरंगें (20,000 Hz से अधिक) - चमगादड़, सोनार विभिन्न माध्यमों में ध्वनि की गति (m/s) वायु 343, जल 1500, लोहा 5100 ठोस में सबसे अधिक, गैस में सबसे कम सूत्र: v = f × λ तथा T = 1/f स्वर्ण नियम मानव श्रव्य परिसर 20 Hz से 20,000 Hz तक है।

8. सामान्य त्रुटियाँ

  1. छात्र ध्वनि को अनुप्रस्थ तरंग मान लेते हैं; वायु में ध्वनि अनुदैर्घ्य तरंग है।
  2. यह मानना कि ध्वनि निर्वात में भी चलती है; ध्वनि को माध्यम की आवश्यकता होती है।
  3. तरंग गति के सूत्र v = f/λ लिखना; सही सूत्र v = f × λ है।
  4. ध्वनि की गति वायु में सबसे अधिक मानना; सही क्रम ठोस > द्रव > गैस है।
  5. श्रव्य परिसर को 20 Hz से 20 MHz मानना; सही सीमा 20 Hz से 20,000 Hz है।
  6. प्रतिध्वनि की न्यूनतम दूरी 17.2 मीटर के स्थान पर 17.2 सेमी लिखना।
  7. आवृत्ति बढ़ने पर समय काल भी बढ़ना मानना; सही संबंध T = 1/f है, अतः T घटता है।
  8. डेसीबल को ध्वनि की आवृत्ति की इकाई मानना; डेसीबल तीव्रता की इकाई है।

9. परीक्षा युक्तियाँ

  1. v = f × λ का सूत्र और उसका व्युत्क्रम λ = v/f रटें, संख्यात्मक में सबसे अधिक उपयोगी है।
  2. माध्यम में ध्वनि की गति का क्रम ठोस > द्रव > गैस याद रखें।
  3. श्रव्य परिसर 20 Hz - 20,000 Hz और प्रतिध्वनि दूरी 17.2 m रटें।
  4. निर्वात में ध्वनि नहीं चलती, यह तथ्य हमेशा ध्यान रखें (चंद्रमा पर ध्वनि नहीं)।
  5. पराश्रव्य तरंगों के उपयोग — सोनार, अल्ट्रासाउंड — प्रश्न में आ सकते हैं।
  6. ध्वनि की तीव्रता की इकाई डेसीबल (dB) और श्रवण क्षति सीमा 85 dB याद रखें।
  7. संख्यात्मक प्रश्नों में आवृत्ति को kHz से Hz में बदलना न भूलें।
  8. प्रतिध्वनि के प्रश्न में दूरी की गणना में 2d लेने का ध्यान रखें।

10. निष्कर्ष

ध्वनि तरंगें भौतिकी का एक महत्वपूर्ण और रोचक अध्याय है। इस अध्याय में हमने ध्वनि की अनुदैर्घ्य तरंग प्रकृति, संपीड़न-विरलन की अवधारणा, तरंग की विशेषताएँ (आवृत्ति, तरंगदैर्घ्य, आयाम, समय काल), तरंग गति का सूत्र v = f × λ तथा विभिन्न माध्यमों में ध्वनि की गति का अध्ययन किया। हमने श्रव्य परिसर, अवश्रव्य और पराश्रव्य तरंगों, प्रतिध्वनि और मानव कान की संरचना को भी समझा। रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 परीक्षा में इस विषय से 2 से 3 प्रश्न अवश्य आते हैं। सूत्रों की सटीक पकड़, इकाइयों की संगति और व्यावहारिक उदाहरणों की जानकारी से विद्यार्थी इन प्रश्नों को आसानी से हल कर सकता है। ध्वनि की समझ आगे प्रतिध्वनि, आवृत्ति-आयाम-पिच और ध्वनि के परावर्तन के विषयों की नींव है।