विषय: रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 अध्याय: भौतिकी – विद्युत और चुंबकत्व विषय-वस्तु: 13.5 श्रेणी और समानांतर परिपथ
विद्युत परिपथ में प्रतिरोधकों को जोड़ने के दो प्रमुख तरीके होते हैं — श्रेणी संयोजन और समानांतर संयोजन। श्रेणी संयोजन में प्रतिरोधकों को एक के बाद एक जोड़ा जाता है, जिससे धारा के लिए केवल एक ही मार्ग होता है। समानांतर संयोजन में सभी प्रतिरोधकों को दो समान बिंदुओं के बीच जोड़ा जाता है, जिससे धारा के कई मार्ग बन जाते हैं। इन दोनों संयोजनों के व्यवहार, गुणधर्म और गणना की विधियाँ अलग-अलग होती हैं। रेलवे की विद्युत वायरिंग और सिग्नल परिपथों में दोनों प्रकार के संयोजनों का उपयोग किया जाता है।
श्रेणी संयोजन में सभी प्रतिरोधकों से समान धारा प्रवाहित होती है, परंतु विभवांतर विभिन्न प्रतिरोधकों में विभाजित हो जाता है। यदि परिपथ के किसी एक भाग में धारा रुकती है (तार टूटने से), तो पूरा परिपथ कार्य करना बंद कर देता है। इसके विपरीत समानांतर संयोजन में सभी प्रतिरोधकों पर समान विभवांतर होता है, परंतु धारा विभिन्न शाखाओं में विभाजित हो जाती है। समानांतर परिपथ में यदि एक शाखा में विघ्न आ जाए, तो अन्य शाखाएँ सामान्य रूप से कार्य करती रहती हैं। इसीलिए घरेलू विद्युत वायरिंग में उपकरणों को समानांतर में जोड़ा जाता है।
इस अध्याय में हम श्रेणी और समानांतर परिपथों की परिभाषा, उनमें धारा और विभवांतर का वितरण, कुल प्रतिरोध के सूत्र R = R₁ + R₂ + ... और 1/R = 1/R₁ + 1/R₂ + ..., किरचॉफ के नियम, विभाजक नियम तथा दोनों संयोजनों की तुलना का अध्ययन करेंगे। संख्यात्मक उदाहरणों द्वारा परिपथ विश्लेषण का अभ्यास करना परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक है।
जब कई प्रतिरोधकों को इस प्रकार जोड़ा जाता है कि एक प्रतिरोधक का अंत दूसरे के आरंभ से जुड़ा हो, तो उसे श्रेणी संयोजन कहते हैं। श्रेणी परिपथ में धारा केवल एक ही मार्ग से प्रवाहित होती है।
श्रेणी परिपथ के गुणधर्म:
धारा समान: श्रेणी परिपथ में हर प्रतिरोधक से समान मात्रा में धारा प्रवाहित होती है, अर्थात् I₁ = I₂ = I₃ = I।
विभवांतर विभाजित: कुल विभवांतर सभी प्रतिरोधकों के विभवांतरों के योग के बराबर होता है, अर्थात् V = V₁ + V₂ + V₃ + ...।
कुल प्रतिरोध: श्रेणी संयोजन का कुल प्रतिरोध सभी प्रतिरोधों के योग के बराबर होता है:
R = R₁ + R₂ + R₃ + ...
श्रेणी परिपथ का कुल प्रतिरोध हमेशा सबसे बड़े प्रतिरोध से भी अधिक होता है। चूँकि कुल प्रतिरोध अधिक होता है, इसलिए कुल धारा कम होती है। यही कारण है कि बल्बों को श्रेणी में जोड़ने पर वे कम चमकते हैं।
उदाहरण 1: 2 Ω, 4 Ω और 6 Ω के प्रतिरोधक श्रेणी में जुड़े हैं। 12 वोल्ट की आपूर्ति लगाई गई है। कुल प्रतिरोध और परिपथ में धारा ज्ञात कीजिए।
हल: R = 2 + 4 + 6 = 12 ओम। धारा I = V/R = 12/12 = 1 एम्पियर। सभी प्रतिरोधकों में धारा समान, 1 एम्पियर है।
जब कई प्रतिरोधकों के एक सिरे को एक सामान्य बिंदु पर और दूसरे सिरों को दूसरे सामान्य बिंदु पर जोड़ा जाता है, तो उसे समानांतर संयोजन कहते हैं। समानांतर परिपथ में धारा के लिए कई मार्ग होते हैं।
समानांतर परिपथ के गुणधर्म:
विभवांतर समान: समानांतर परिपथ में सभी प्रतिरोधकों पर समान विभवांतर होता है, अर्थात् V₁ = V₂ = V₃ = V।
धारा विभाजित: कुल धारा सभी शाखाओं की धाराओं के योग के बराबर होती है, अर्थात् I = I₁ + I₂ + I₃ + ...।
कुल प्रतिरोध: समानांतर संयोजन के कुल प्रतिरोध का व्युत्क्रम, सभी प्रतिरोधों के व्युत्क्रमों के योग के बराबर होता है:
1/R = 1/R₁ + 1/R₂ + 1/R₃ + ...
समानांतर परिपथ का कुल प्रतिरोध सबसे छोटे प्रतिरोध से भी कम होता है। कम कुल प्रतिरोध के कारण परिपथ में अधिक धारा प्रवाहित हो सकती है। दो प्रतिरोधों के विशेष स्थिति में R = (R₁ × R₂) / (R₁ + R₂) सूत्र उपयोगी होता है।
उदाहरण 2: 2 Ω और 3 Ω के दो प्रतिरोधक समानांतर में जुड़े हैं। कुल प्रतिरोध ज्ञात कीजिए।
हल: 1/R = 1/2 + 1/3 = 5/6, इसलिए R = 6/5 = 1.2 ओम। यह दोनों प्रतिरोधों से कम है।
उदाहरण 3: समानांतर परिपथ में 6 Ω और 12 Ω प्रतिरोधक जुड़े हैं और परिपथ में कुल धारा 3 एम्पियर है। प्रत्येक शाखा की धारा ज्ञात कीजिए। विभवांतर 12 वोल्ट है।
हल: I₁ = V/R₁ = 12/6 = 2 एम्पियर। I₂ = V/R₂ = 12/12 = 1 एम्पियर। कुल धारा I = I₁ + I₂ = 3 एम्पियर, जो दी गई धारा के बराबर है। इससे सत्यापन होता है।
किरचॉफ के नियम जटिल परिपथों के विश्लेषण में उपयोगी होते हैं। इनके दो नियम हैं:
किरचॉफ का धारा नियम (KCL): किसी संधि बिंदु पर प्रवेश करने वाली धाराओं का योग, उस बिंदु से निकलने वाली धाराओं के योग के बराबर होता है। यह आवेश संरक्षण के सिद्धांत पर आधारित है। इसका अर्थ है कि किसी बिंदु पर आवेश एकत्रित नहीं होता।
किरचॉफ का वोल्टेज नियम (KVL): किसी बंद लूप में सभी विभवांतरों का बीजगणितीय योग शून्य होता है। यह ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत पर आधारित है। किसी बंद परिपथ में लगाया गया कुल विभवांतर, सभी प्रतिरोधों पर हुए विभव पतनों के योग के बराबर होता है।
मिश्रित संयोजन: जब किसी परिपथ में कुछ प्रतिरोधक श्रेणी में और कुछ समानांतर में जुड़े हों, तो उसे मिश्रित संयोजन कहते हैं। मिश्रित संयोजन के कुल प्रतिरोध को ज्ञात करने के लिए पहले समानांतर वाले भाग का तुल्य प्रतिरोध निकाला जाता है, फिर उसे श्रेणी वाले प्रतिरोधों में जोड़ा जाता है।
उदाहरण 4: एक मिश्रित परिपथ में 3 Ω और 6 Ω समानांतर में जुड़े हैं और उनके श्रेणी में 2 Ω जुड़ा है। कुल प्रतिरोध ज्ञात कीजिए।
हल: समानांतर भाग 1/Rₚ = 1/3 + 1/6 = 3/6, इसलिए Rₚ = 2 ओम। कुल प्रतिरोध R = Rₚ + 2 = 2 + 2 = 4 ओम।
| गुण | श्रेणी परिपथ | समानांतर परिपथ |
|---|---|---|
| धारा | सभी में समान | शाखाओं में विभाजित |
| विभवांतर | विभाजित | सभी पर समान |
| कुल प्रतिरोध | R = R₁ + R₂ + ... | 1/R = 1/R₁ + 1/R₂ + ... |
| प्रतिरोध की तुलना | सबसे बड़े से अधिक | सबसे छोटे से कम |
| विघ्न का प्रभाव | पूरा परिपथ बंद | केवल उसी शाखा पर प्रभाव |
| उपयोग | विभाजक, ट्यूबलाइट | घरेलू वायरिंग |
| स्थिति | सूत्र |
|---|---|
| दो समानांतर प्रतिरोध | R = (R₁ × R₂) / (R₁ + R₂) |
| n समान प्रतिरोध समानांतर | R = R₁/n |
| n समान प्रतिरोध श्रेणी | R = n × R₁ |
| किरचॉफ धारा नियम | ΣI = 0 (संधि पर) |
| किरचॉफ वोल्टेज नियम | ΣV = 0 (लूप में) |
flowchart TD
A[श्रेणी और समानांतर परिपथ] --> B[श्रेणी परिपथ]
A --> C[समानांतर परिपथ]
A --> D[किरचॉफ के नियम]
A --> E[मिश्रित संयोजन]
B --> B1[धारा समान]
B --> B2[R = R1 + R2 + ...]
B --> B3[V विभाजित]
C --> C1[V समान]
C --> C2[1/R = 1/R1 + 1/R2 + ...]
C --> C3[I विभाजित]
D --> D1[KCL संधि पर]
D --> D2[KVL लूप में]
E --> E1[पहले समानांतर फिर श्रेणी]
(R₁R₂)/(R₁+R₂) को दो से अधिक प्रतिरोधों पर लगाना।R = R₁R₂/(R₁+R₂) उपयोग करके समय बचाएँ।श्रेणी और समानांतर परिपथ विद्युत प्रणालियों के दो मूलभूत संयोजन हैं। इस अध्याय में हमने श्रेणी परिपथ की विशेषताएँ — समान धारा, विभाजित विभवांतर और योग के बराबर कुल प्रतिरोध — को समझा। समानांतर परिपथ में समान विभवांतर, विभाजित धारा और व्युत्क्रमों के योग के बराबर कुल प्रतिरोध के सिद्धांतों का अध्ययन किया। किरचॉफ के धारा और वोल्टेज नियमों के माध्यम से जटिल परिपथों के विश्लेषण की विधि भी सीखी। संख्यात्मक उदाहरणों से कुल प्रतिरोध और शाखा धाराओं की गणना का अभ्यास किया। रेलवे की विद्युत वायरिंग, सिग्नलिंग और पावर प्रणालियों में इन संयोजनों की समझ सर्वथा आवश्यक है, क्योंकि सही संयोजन के बिना उपकरण सही विभवांतर और धारा प्राप्त नहीं कर सकते। इन परिपथों का नियमित अभ्यास विद्युत विज्ञान की ओर एक मजबूत कदम है।